Saturday, 31 December 2011

मैकू(मुंशी प्रेमचन्द)

कादिर और मैकू
ताड़ीखाने के
सामने पहूँचे;
तो वहॉँ कॉँग्रेस के
वालंटियर
झंडा लिए खड़े नजर
आये। दरवाजे के
इधर-उधर
हजारों दर्शक खड़े
थे। शाम का वक्त
था। इस वक्त
गली में
पियक्कड़ों के
सिवा और कोई न
आता था। भले
आदमी इधर से
निकलते झिझकते।
पियक्कड़ों की
छोटी-
छोटी टोलियॉँ
आती-
जाती रहती थीं।
दो-चार वेश्याऍं
दूकान के सामने
खड़ी नजर
आती थीं। आज यह
भीड़-भाड़ देख कर
मैकू ने कहा—
बड़ी भीड़ है बे,
कोई दो-तीन
सौ आदमी होंगे।
कादिर ने
मुस्करा कर
कहा—भीड़ देख
कर डर गये क्या?
यह सब हुर्र
हो जायँगे, एक
भी न टिकेगा। यह
लोग तमाशा देखने
आये हैं,
लाठियॉँ खाने
नहीं आये हैं।
मैकू ने संदेह के स्वर
में कहा—पुलिस के
सिपाही भी बैठे
हैं। ठीकेदार ने
तो कहा थ, पुलिस
न बोलेगी।
कादिर—हॉँ बे ,
पुलिस न बोलेगी,
तेरी नानी क्यों
मरी जा रही है ।
पुलिस
वहॉँ बोलती है,
जहॉँ चार पैसे
मिलते है
या जहॉँ कोई औरत
का मामला होता
है। ऐसी बेफजूल
बातों में पुलिस
नहीं पड़ती।
पुलिस तो और शह
दे रही है।
ठीकेदार से साल में
सैकड़ों रुपये मिलते
हैं। पुलिस इस वक्त
उसकी मदद न
करेगी तो कब
करेगी?
मैकू—चलो, आज दस
हमारे भी सीधे
हुए। मुफ्त में पियेंगे
वह अलग, मगर हम
सुनते हैं,
कॉँग्रेसवालों में
बड़े-बड़े मालदार
लोग शरीक है। वह
कहीं हम लोगों से
कसर निकालें
तो बुरा होगा।
कादिर—अबे,
कोई कसर-वसर
नहीं निकालेगा,
तेरी जान
क्यों निकल
रही है?
कॉँग्रेसवाले
किसी पर हाथ
नहीं उठाते, चाहे
कोई उन्हें मार
ही डाले।
नहीं तो उस दिन
जुलूस में दस-बारह
चौकीदारों की
मजाल थी कि दस
हजार
आदमियों को पीट
कर रख देते। चार
तो वही ठंडे
हो गये थे, मगर एक
ने हाथ
नहीं उठाया।
इनके
जो महात्मा हैं,
वह बड़े
भारी फकीर है !
उनका हुक्म है
कि चुपके से मार
खा लो, लड़ाई मत
करो।
यों बातें करते-
करते
दोनों ताड़ीखाने
के द्वार पर पहुँच
गये। एक स्वयंसेवक
हाथ जोड़कर
सामने आ गया और
बोला –भाई
साहब, आपके मजहब
में ताड़ी हराम है।
मैकू ने बात
का जवाब चॉँटे से
दिया ।
ऐसा तमाचा
मारा कि
स्वयंसेवक
की ऑंखों में खून आ
गया। ऐसा मालूम
होता था,
गिरा चाहता है।
दूसरे स्वयंसेवक ने
दौड़कर उसे
सँभाला।
पॉँचों उँगलियो
का रक्तमय
प्रतिबिम्ब झलक
रहा था।
मगर वालंटियर
तमाचा खा कर
भी अपने स्थान पर
खड़ा रहा। मैकू ने
कहा—अब
हटता है कि और
लेगा?
स्वयंसेवक ने
नम्रता से कहा—
अगर
आपकी यही इच्छा
है, तो सिर सामने
किये हुए हूँ।
जितना चाहिए,
मार लीजिए।
मगर अंदर न
जाइए।
यह कहता हुआ वह
मैकू के सामने बैठ
गया ।
मैकू ने स्वयंसेवक के
चेहरे पर निगाह
डाली।
उसकी पॉचों
उँगलियों के
निशान झलक रहे
थे। मैकू ने इसके पहले
अपनी लाठी से टूटे
हुए कितने ही सिर
देखे थे, पर आज की-
सी ग्लानी उसे
कभी न हुई थी। वह
पाँचों उँगलियों के
निशान
किसी पंचशूल
की भॉति उसके
ह्रदय में चुभ रहे थे।
कादिर
चौकीदारों के
पास खड़ा सिगरेट
पीने लगा।
वहीं खड़े-खड़े
बोला—अब,
खड़ा क्या देखता है
, लगा कसके एक
हाथ।
मैकू ने स्वयंसेवक से
कहा—तुम उठ
जाओ, मुझे अन्दर
जाने दो।
‘आप
मेरी छाती पर
पॉँव रख कर चले
जा सकते हैं।’
‘मैं कहता हूँ, उठ
जाओ, मै अन्दर
ताड़ी न पीउँगा ,
एक दूसरा ही काम
है।’
उसने यह बात कुछ
इस दृढ़ता से
कही कि स्वयंसेवक
उठकर रास्ते से हट
गया। मैकू ने
मुस्करा कर
उसकी ओर ताका ।
स्वयंसेवक ने फिर
हाथ जोड़कर
कहा—
अपना वादा भूल न
जाना।
एक चौकीदार
बोला—लात के
आगे भूत भागता है,
एक ही तमाचे में
ठीक हो गया !
कादिर ने कहा—
यह
तमाचा बच्चा को
जन्म-भर याद
रहेगा। मैकू के
तमाचे सह
लेना मामूली काम
नहीं है।
चौकीदार—आज
ऐसा ठोंको इन
सबों को कि फिर
इधर आने को नाम
न लें ।
कादिर—खुदा ने
चाहा, तो फिर
इधर आयेंगे
भी नहीं। मगर हैं
सब बड़े हिम्मती।
जान को हथेली पर
लिए फिरते हैं।
2
मैकू भीतर पहुँचा,
तो ठीकेदार ने
स्वागत किया –
आओ मैकू मियॉँ ! एक
ही तमाचा लगा
कर क्यो रह गये?
एक तमाचे
का भला इन पर
क्या असर होगा?
बड़े लतखोर हैं सब।
कितना ही पीटो,
असर
ही नहीं होता।
बस आज सबों के
हाथ-पॉँव तोड़
दो; फिर इधर न
आयें ।
मैकू—तो क्या और
न आयेंगें?
ठीकेदार—फिर
आते सबों की नानी
मरेगी।
मैकू—और
जो कहीं इन
तमाशा देखनेवालों
ने मेरे ऊपर डंडे
चलाये तो!
ठीकेदार—
तो पुलिस
उनको मार
भगायेगी। एक
झड़प में मैदान साफ
हो जाएगा। लो,
जब तक एकाध
बोतल पी लो। मैं
तो आज मुफ्त
की पिला रहा हूँ।
मैकू—क्या इन
ग्राहकों को भी
मुफ्त ?
ठीकेदार –
क्या करता , कोई
आता ही न था।
सुना कि मुफ्त
मिलेगी तो सब धँस
पड़े।
मैकू—मैं तो आज न
पीऊँगा।
ठीकेदार—क्यों?
तुम्हारे लिए
तो आज
ताजी ताड़ी
मँगवायी है।
मैकू—यों ही , आज
पीने
की इच्छा नहीं है।
लाओ, कोई
लकड़ी निकालो,
हाथ से मारते
नहीं बनता ।
ठीकेदार ने लपक
कर एक
मोटा सोंटा मैकू के
हाथ में दे दिया,
और डंडेबाजी का
तमाशा देखने के
लिए द्वार पर
खड़ा हो गया ।
मैकू ने एक क्षण डंडे
को तौला, तब
उछलकर ठीकेदार
को ऐसा डंडा
रसीद
किया कि वहीं
दोहरा होकर
द्वार में गिर
पड़ा। इसके बाद
मैकू ने
पियक्कड़ों की ओर
रुख किया और
लगा डंडों की
वर्षा करने। न आगे
देखता था, न पीछे,
बस डंडे चलाये
जाता था।
ताड़ीबाजों के नशे
हिरन हुए ।
घबड़ा-घबड़ा कर
भागने लगे, पर
किवाड़ों के बीच में
ठीकेदार की देह
बिंधी पड़ी थी।
उधर से फिर भीतर
की ओर लपके। मैकू ने
फिर डंडों से
आवाहन किया ।
आखिर सब
ठीकेदार की देह
को रौद-रौद कर
भागे।
किसी का हाथ
टूटा,
किसी का सिर
फूटा,
किसी की कमर
टूटी। ऐसी भगदड़
मची कि एक मिनट
के अन्दर
ताड़ीखाने में एक
चिड़िये का पूत
भी न रह गया।
एकाएक मटकों के
टूटने की आवाज
आयी। स्वयंसेवक ने
भीतर झाँक कर
देखा, तो मैकू
मटकों को विध्वंस
करने में जुटा हुआ
था। बोला—भाई
साहब, अजी भाई
साहब, यह आप
गजब कर रहे हैं।
इससे
तो कहीं अच्छा कि
आपने हमारे
ही ऊपर
अपना गुस्सा
उतारा होता।
मैंकू ने दो-तीन
हाथ चलाकर
बाकी बची हुई
बोतलों और
मटकों का सफाया
कर दिया और तब
चलते-चलते
ठीकेदार को एक
लात जमा कर
बाहर निकल
आया।
कादिर ने
उसको रोक कर
पूछा –तू पागल
तो नहीं हो गया है
बे?
क्या करने
आया था, और
क्या कर रहा है।
मैकू ने लाल-लाल
ऑंखों से उसकी ओर
देख कर कह—
हॉँ अल्लाह
का शुक्र है कि मैं
जो करने आया था,
वह न करके कुछ और
ही कर बैठा। तुममें
कूवत हो,
तो वालंटरों को
मारो, मुझमें कूवत
नहीं है। मैंने
तो जो एक थप्पड़
लगाया।
उसका रंज अभी तक
है और
हमेशा रहेगा !
तमाचे के निशान
मेरे कलेजे पर बन
गये हैं। जो लोग
दूसरों को गुनाह से
बचाने के लिए
अपनी जान देने
को खड़े हैं, उन पर
वही हाथ
उठायेगा,
जो पाजी है,
कमीना है, नामर्द
है। मैकू फिसादी है,
लठैत ,गुंडा है, पर
कमीना और
नामर्द नहीं हैं।
कह
दो पुलिसवालों से ,
चाहें तो मुझे
गिरफ्तार कर लें।
कई ताड़ीबाज खड़े
सिर सहलाते हुए,
उसकी ओर
सहमी हुई ऑंखो से
ताक रहै थे। कुछ
बोलने की हिम्मत
न पड़ती थी। मैकू ने
उनकी ओर देख कर
कहा –मैं कल फिर
आऊँगा। अगर तुममें
से किसी को यहॉँ
देखा तो खून
ही पी जाऊँगा !
जेल और फॉँसी से
नहीं डरता।
तुम्हारी भलमनसी
इसी में है कि अब
भूल कर भी इधर न
आना । यह
कॉँग्रेसवाले
तुम्हारे दुश्मन
नहीं है। तुम्हारे
और तुम्हारे बाल-
बच्चों की भलाई के
लिए ही तुम्हें पीने
से रोकते हैं। इन
पैसों से अपने बाल-
बच्चो की
परवरिश करो,
घी-दूध खाओ। घर
में तो फाके हो रहै
हैं,
घरवाली तुम्हारे
नाम
को रो रही है, और
तुम यहॉँ बैठे
पी रहै हो? लानत
है इस नशेबाजी पर

मैकू ने
वहीं डंडा फेंक
दिया और कदम
बढ़ाता हुआ घर
चला। इस वक्त तक
हजारों आदमियों
का हुजूम
हो गया था।
सभी श्रद्धा, प्रेम
और गर्व
की ऑंखो से मैकू
को देख रहे थे।

Wednesday, 28 December 2011

पुत्रवधू की अक्लमंदी

एक किसान था। इस
बार फसल कम होने
की वजह से चिंतित था।
घर में राशन ग्यारह
महीने चल सके
उतना ही था।
बाकी एक महीने
का राशन कैसे लायेगा,
कहाँ से इसका इंतजाम
होगा यह चिंता उसे
बार-बार
सता रही थी।
किसान की पुत्रवधू ने
यह ध्यान
दिया कि पिताजी कि
सी बात को लेकर
परेशान है। पुत्रवधू ने
किसान से पूछा कि -
"क्या बात है,
पिताजी ? आप
इतना परेशान
क्यों है ?"
तब किसान ने
अपनी चिंता का कारण
पुत्रवधू
को बताया कि - "इस
साल फसल कम होने
कि वजह से ग्यारह
महीने चल सके
उतना ही राशन है।
बाकी एक महिना कैसे
गुजरेगा यही सोच
रहा है ?"
किसान की यह बात
सुनकर पुत्रवधू ने
थोडा सोचकर कहा -
"पिताजी, आप
चिंता ना करे, बेफिक्र
हो जाए,
उसका इंतजाम
हो जायेगा।"
ग्यारह महीने बीत
गए, अब
बारहवा महिना भी आ
राम से पसार हो गया।
किसान सोच में पड़
गया कि - "घर में अनाज
तो ग्यारह महीने चले
उतना ही था, तो ये
बारहवा महिना आराम
से कैसे गुजरा ?"
किसान ने
अपनी पुत्रवधू
को बुलवाकर पूछा -
"बेटी, ग्यारह महीने
का राशन बारहवे
महीने तक कैसे चला ?
यह चमत्कार कैसे हुआ ?"
तब पुत्रवधू ने जवाब
दिया कि - "पिताजी,
राशन तो ग्यारह
महीने चले
उतना ही था। किन्तु,
जिस दिन आपने
अपनी चिंता का कारण
बताया... उसी दिन से
रसोई के लिए
जो भी अनाज
निकालती उसी में से
एक-दो मुट्ठी हररोज
वापस कोठी में दाल
देती। बस उसी की वजह
से यह बारहवे महीने
का इंतजाम हो गया।
और बिना तकलिफ़ के
बारहवा महिना आराम
से गुजर गया।"
किसान ने यह बात
सुनी तो दंग सा रह
गया । और
अपनी पुत्रवधू की बचत
समझदारी की अकलमंदी
पर गर्व करने लगा।

Tuesday, 20 December 2011

साहस

एक
बकरी थी।
एक उसका मेमना।
दोनों जंगल में चर रहे
थे। चरते - चरते
बकरी को प्यास
लगी। मेमने
को भी प्यास लगी।
बकरी बोली - 'चलो,
पानी पी आएँ।' मेमने
ने भी जोड़ा, 'हाँ माँ!
चलो पानी पी आएँ।'
पानी पीने के लिए
बकरी नदी की ओर
चल दी।
मेमना भी पानी पीने
के लिए नदी की ओर
चल पड़ा।
दोनों चले। बोलते-
बतियाते। हँसते-
गाते। टब्बक-टब्बक।
टब्बक-टब्बक।
बातों-बातों में
बकरी ने मेमने
को बताया - 'साहस
से काम लो तो संकट
टल जाता है। धैर्य
यदि बना रहे
तो विपत्ति से
बचाव
का रास्ता निकल
ही आता है।
माँ की सीख मेमने ने
गाँठ बाँध ली।
दोनों नदी तट पर
पहुँचे। वहाँ पहुँचकर
बकरी ने
नदी को प्रणाम
किया। मेमने ने
भी नदी को प्रणाम
किया। नदी ने
दोनों का स्वागत
कर उन्हें सूचना दी,
'भेड़िया आने
ही वाला है।
पानी पीकर फौरन
घर की राह लो।'
'भेड़िया गंदा है। वह
मुझ जैसे छोटे
जीवों पर रौब
झाड़ता है। उन्हें
मारकर
खा जाता है। वह
घमंडी भी है। तुम उसे
अपने पास क्यों आने
देती हो।
पानी पीने से
मना क्यों नही कर
देती।' मेमने ने नदी से
कहा।
नदी मुस्कुराई।
बोली- 'मैं जानती हूँ
कि भेड़िया गंदा है।
अपने से छोटे
जीवों को सताने
की उसकी आदत मुझे
जरा भी पसंद
नहीं है। पर
क्या करूँ। वह जब
भी मेरे पास आता है,
प्यासा होता है।
प्यास
बुझाना मेरा धर्म
हैं। मैं उसे
मना नहीं कर
सकती।'
बकरी को बहुत जोर
की प्यास लगी थी।
मेमने को भी बहुत
जोर की प्यास
लगी थी।
दोनों नदी पर झुके।
नदी का पानी शीतल
था। साथ में
मीठा भी। बकरी ने
खूब पानी पिया।
मेमने ने भी खूब
पानी पिया।
पानी पीकर
बकरी ने डकार ली।
पानी पीकर मेमने
को भी डकार आई।
डकार से पेट
हल्का हुआ
तो दोनों फिर
नदी पर झुक गए।
पानी पीने लगे।
नदी उनसे कुछ
कहना चाहती थी।
मगर
दोनों को पानी पीते
देख चुप रही।
बकरी ने उठकर
पानी पिया। मेमने
ने भी उठकर
पानी पिया।
पानी पीकर
बकरी मुड़ी तो उसे
जोर
का झटका लगा।
लाल आँखों,
राक्षसी डील-डौल
वाला भेड़िया सामने
खड़ा था। उसके
शरीर का रक्त जम-
सा गया।
मेमना भी भेड़िये
को देख घबराया।
थोड़ी देर तक
दोनों को कुछ न
सूझा।
'अरे वाह! आज तो ठंडे
जल के साथ
गरमागरम भोजन
भी है। अच्छा हुआ
जो तुम
दोनों यहाँ मिल
गए। बड़ी जोर
की भूख लगी है। अब मैं
तुम्हें खाकर पहले
अपनी भूख
मिटाऊँगा।
पानी बाद में
पिऊँगा।
तब तक बकरी संभल
चुकी थी।
मेमना भी संभल
चुका था।
'छि; छि; कितने गंदे
हो तुम। मुँह पर
मक्खियाँ भिनभिना रही है।
लगता है महीनों से
मुँह नहीं धोया।
मेमना बोला।
भेड़िया सकपकाया।
बगले झाँकने लगा।
'जाने दे बेटा। ये ठहरे
जंगल के मंत्री।
बड़ों की बड़ी बातें।
हम उन्हें कैसे समझ
सकते हैं। हो सकता है
भेड़िया दादा ने मुँह
न धोने के लिए कसम
उठा रखी हो।'
बकरी ने बात
बढ़ाई।
'क्या बकती है।
थोड़ी देर पहले
ही तो रेत में रगड़कर
मुँह साफ किया है।'
भेड़िया गुर्राया।
'झूठे कहीं के। मुँह
धोया होता तो क्या ऐसे
ही दिखते। तनिक
नदी में झाँक कर
देखो। असलियत
मालूम पड़ जाएगी।'
हिम्मत बटोर कर
मेमने ने कहा।
भेड़िया सोचने लगा।
बकरी बड़ी है।
उसका भरोसा नहीं।
यह
नन्हाँ मेमना भला क्या झूठ
बोलेगा। रेत से
रगड़ा था,
हो भी सकता है
वहीं पर
गंदी मिट्टी से मुँह
सन गया हो । ऐसे में
इन्हें
खाऊँगा तो नाहक
गंदगी पेट में
जाएगी। फिर
नदी तक जाकर उसमें
झाँककर देखने में
भी कोई
हर्जा नहीं है।
ऐसा संभव नहीं कि मैं
पानी में झाँकू और ये
दोनों भाग जाएँ।
"ऊँह, भागकर जाएँगे
भी कहाँ। एक झपट्टे
में पकड़ लूँगा।
'देखो! मैं मुँह धोने
जा रहा हूँ। भागने
की कोशिश मत
करना।
वरना बुरी मौत
मारूँगा।' भेड़िया ने
धमकी दी।
बकरी हाथ जोड़कर
कहने लगी,
'हमारा तो जन्म
ही आप जैसों की भूख
मिटाने के लिए हुआ
है। हमारा शरीर
जंगल के मंत्री की भूख
मिटानै के काम आए
हमारे लिए इससे
ज्यादा बड़ी बात
भला और
क्या हो सकती है।
आप तसल्ली से मुँह
धो लें। यहाँ से बीस
कदम आगे
नदी का पानी बिल्कुल
साफ है। वहाँ जाकर
मुँह धोएँ। विश्वास
न हो तो मैं भी साथ
में चलती हूँ।'
भेड़िये को बात
भा गई। वह उस ओर
बढ़ा जिधर बकरी ने
इशारा किया था।
वहाँ पर
पानी काफी गहरा था।
किनारे चिकने। जैसे
ही भेड़िये ने
अपना चेहरा देखने के
लिए नदी में झाँका,
पीछे से बकरी ने
अपनी पूरी ताकत
समेटकर जोर
का धक्का दिया।
भेड़िया अपने
भारी भरकम शरीर
को संभाल न
पाया और 'धप' से
नदी में जा गिरा।
उसके गिरते
ही बकरी ने वापस
जंगल की दिशा में
दौड़ना शुरू कर
दिया। उसके पीछे
मेमना भी था।
दोनों नदी से
काफी दूर निकल
आए। सुरक्षित स्थान
पर पहुँचकर
बकरी रुकी।
मेमना भी रुका।
बकरी ने लाड़ से मेमने
को देखा। मेमने ने
विजेता के से दर्प
साथ
अपनी माँ की आँखों में
झाँका। दोनों के
चेहरों से
आत्मविश्वास झलक
रहा था।
बकरी बोली --
‘कुछ समझे?'
'हाँ समझा।'
'क्या ?
'साहस से काम
लो तो खतरा टल
जाता है।'
'और?'
'धैर्य यदि बना रहे
तो विपत्ति से बचने
का रास्ता निकल
ही आता है।'
'शाबाश!'
बकरी बोली।
इसी के साथ वह हँसने
लगी। माँ के साथ-
साथ मेमना भी हँसने
लगा।

Sunday, 18 December 2011

राजकुमार का अदम्य साहस-8

जब जहाज किनारे
आकर
लगा तो राजकुमार ने
देखा कि वजीर
का लड़का वहां उपस्थ
था। राजकुमार ने
पद्मिनी से
उसका परिचय कराते
हुए कहा, “यह
मेरा साथी है। सागर
की यात्रा आरंभ करने
तक मेरे दु:ख-सुख में
इसने बराबर
मेरा साथ दिया।”
वजीर
का लड़का पद्मिनी क
गदगद् हो गया। उस
दिन वहीं रहने के
लिए उसने एक भवन
की व्यवस्था कर
रक्खी थी।
वहां पहुंचने पर
राजकुमार
को मैना की बात
याद आ गई।
राजकुमार ने कहा,
“हमें
यहां नहीं ठहराना।
और कोई भवन देखो।”
वजीर के लड़के ने
कहा, “आपके आने से
पहले मैं यहां के सारे
भवन देख चुका हूं। यह
सबसे अच्छा है।” पर
राजकुमार ने
उसकी एक न सुनी।
वजीर के लड़के ने दूसरे
भवन की खोज की।
दूसरा भवन उस भवन
के पास ही मिल
गया। वे लोग उसमें
ठहर गये। बड़ी देर
तक राजकुमार उसे
अपनी कहानी सुनात
फिर वे सो गये।
आधी रात के बाद
जोर की गड़गड़ाहट
हुई। वजीर
का लड़का उठकर
बाहर आया तो देखा,
पहला भवन गिरकर
मिट्टी में मिल
गया है। उसने
राजकुमार
की दूरंदेशी की भूरी-
भूरी प्रशंसा की।
पद्मिनी तो सो गई,
लेकिन राजकुमार
रात-भर तारे
गिनता रहा। भोर
होने से पहले
देखता क्या है कि एक
काला विषैला सांप
आया और
कुण्डली मारकर
पद्मिनी के जूते में बैठ
गया। राजकुमार
तो चिंतित होकर उस
घड़ी की प्रतीक्षा क
जूते में बैठे सांप
को मारा ही रहा थ
उसने तलवार निकाल
कर सांप के दो टुकड़े
कर डाले और बाहर
फैंक कर पद्मिनी के
उठने की राह देखने
लगा। थोड़ी देर में
पद्मिनी उठी।
उसकी थकान दूर
हो गई थी और उसके
चेहरे की कांति लौट
आई थी। उसने
मुस्करा कर
राजकुमार की ओर
देखा। राजकुमार
भी मुस्कराकर उसे
पास गया और कुछ देर
तक उसके मुलायम
बालों को सहलाता र
पद्मिनी मन ही मन
विभोर
हो रही थी कि उसे
अपने जीवन साथी के
रूप में एक ऐसा सुन्दर
और
पराक्रमी व्यक्ति म
गया।
वजीर के लड़के ने आगे
की यात्रा उड़नखटो
से करने का विचार
किया और एक
उड़नखटोला मंगवा भ
लेकिन राजकुमार ने
उसमें बैठने से साफ
इनकार कर दिया।
वजीर के लड़के
को बड़ा बुरा लगा,
पर राजकुमार के आगे
उसकी एक न चली। वे
घोड़ों पर सवार
होकर ही आगे बढ़े।
उड़नखटोले में कुछ और
लोग बैठ गये, लेकिन
थोड़ी दूर जाकर
उड़नखटोला धड़ाम से
नीचे आ गिरा और
उसमें बैठे सब
लोगों की जाने
चली गईं। राजकुमार
ने अनुभव
किया कि मैना की भ
थी।
मार्ग में मनमोहक
दूश्यों को देखते हुए वे
लोग आगे बढ़ते गये।
अपने द्वीप से
पद्मिनी कभी बाहर
नहीं गई थी। अब
लम्बी-
चौड़ी दुनिया उसके
सामने थी। तरह तरह
के लोग थे, तरह-तरह
की उनकी पोशाकें
थीं, तरह-तरह के
उनके आचार-विचार
थे। राजकुमार ने
कहा, “पद्मिनी, अब
हम एक ऐसे बाबा के
आश्रम में चल रहे हैं,
जिनके हृदय में प्रेम
का दरिया बहता है।
जो भी उनके पास
जाता है, उसका मन
जीत लेते हैं। जिन
खड़ाऊ को पहनकर मैंने
सागर पार
किया था, वे उन्होंने
ही दिये थे।”
पद्मिनी आश्चर्य कर
रही थी कि आखिर
राजकुमार ने उस
विशाल सागर को कैसे
पार किया! अब
उसका भेद खुल गया।
पद्मिनी ने कहा,
“राजकुमार, संत लोग
मोह-माया से परे
होते हैं, लेकिन कोई-
कोई संत ऐसे भी होते
हैं, जो लोगों के दु:ख-
दर्द को अपने ऊपर ले
लेते हैं।” कहते-कहते
पद्मिनी के भीतर जैसे
करुणा का स्रोत फूट
पड़ा। उसने
उसकी वाणी को अवरू
कर दिया।
बाबा का आश्रम अब
कुछ दूरी पर था।
राजकुमार ने कहा,
“हमें देर भले
ही हो जाये, पर हम
रुकेंगे बाबा के आश्रम
में ही।”
रास्ता काटने के लिए
राजकुमार
पद्मिनी को अच्छे-
अच्छे किस्से
सुनाता रहा। वह
उन्हें ध्यान से
सुनती रही।
अंत में आसमान जब
टिमटिमाते तारों से
जगमगा उठा, वे
आश्रम में पहुंच गये।
बाबा कई दिन से
उनकी राह देख रहे
थे। इतनी देर कैसे
हो गई, यह सोचकर
उनका मन व्याकुल
हो उठता था।
राजकुमार
को पद्मिनी के साथ
सामने देखकर
उनका हृदय हर्ष से
पुलकित हो उठा।
उन्होंने बड़ी ममता से
उनका स्वागत
किया और आश्रम के
सर्वोत्कृष्ट कक्ष में
उन्हें ठहराया। उस
कक्ष में कोई दीवार
नहीं थी। हरी-
भरी वल्लरियों ने
एक-दूसरे से लिपट कर
उस कक्ष का निर्माण
किया था।
पद्मिनी उस कक्ष
को देखकर रोमांचित
हो उठी। बाबा ने
बड़े प्यार से कहा,
“तुम लोग बड़ा सफर
करके आये हो। थक गये
होंगे। कुछ खा-
पी लो और आराम से
सो जाओ।” रात
बढ़ती जा रही थी,
अंधकार
गाढ़ा हो रहा था,
पर उस घने अंधेरे में
भी आश्रम
की आत्मा अपनी माधु
रही थी। आश्रम के
अंतेवासियों ने अपने
शाही मेहमानों के
लिए नाना प्रकार के
व्यंजन तैयार कर दिये
थे। बड़े उल्लास के
वातावरण में
मेहमानों ने आश्रम
का प्रसाद पाया।
प्रत्येक वस्तु
इतनी स्वादिष्ट
थी कि राजकुमार और
पद्मिनी ने अनुभव
किया, मानों वह
किसी देवलोक में आये
हों। बाबा बराबर
उनके नीचे रहे और
उन्हें पुलकित देखकर
स्वयं आनंद विभोर
होते रहे। पद्मिनी ने
कहा, “मैं तो सोच
भी नहीं सकती थी क
में इस प्रकार मंगल
होगा। पर
संतों की महिमा को
जानता है।” यह
सुनकर बाबा से चुप
नहीं रहा गया।
बोले, “पद्मिनी,
आनंद भीतर की चीज़
है। जब
आदमी का अंतर
प्रमुदित होता है
तो बाहर सब कुछ
हरा-भरा दिखाई
देता है।” पद्मिनी ने
सिर हिला कर
बाबा के कथन
को स्वीकृति दी।
प्रसाद ग्रहण करने के
बाद सब सो गये।
बाबा ब्रह्म मुहूर्त में
उठ गये। उन्होंने
आश्रम का एक चक्कर
लगाया, गोशाला में
जाकर
गायों को प्यार
किया। तबतक
राजकुमार और
पद्मिनी उठकर
वहां आ गये। बाबा ने
हंसकर कहा,
“पद्मिनी, तुम इस
आश्रम में एक
भी बूढ़ा पेड़
नहीं पाओगी, और
देखो जब हम
गायों को पुचकारते
हैं, उनकी पीठ पर
हाथ फिरते हैं
तो उनके थनों से दूध
की धारा बहने
लगती है। पेड़-पौधे
और पशु-
पक्षी भी प्यार के
भूखे होते हैं।”
पद्मिनी ने आश्रम में
निगाह
डाली तो सचमुच उसे
एक भी बूढ़ा पेड़
दिखाई
नहीं दिया और
बाबा ने जब
गायों को दुधाया और
उनकी पीठ पर हाथ
फिराया तो उनके
थनों से दूध
की धाराएं बहने
लगीं।
पद्मिनी चकित रह
गई। ऐसा दृश्य उसने
पहले
कभी नहीं देखा था।
आश्रम में मेहमान एक
दिन रहना चाहते थे।
बाबा के प्रेम ने उन्हें
चार दिन रोक
लिया। वहां के
वातावरण में
पद्मिनी का मन
इतना रम
गया कि जब
विदा होने का समय
आया तो वह रोने
लगी। बाबा का दिल
भी भर आया। उन्होंने
कहा, “पद्मिनी,
आश्रम तुम्हारा है।
जब जी में आये, फिर आ
जाना।” राजकुमार
ने बाबा को खड़ाऊं
लौटा दिये और
उनका आशीर्वाद
लेकर आगे बढ़ चले।
राजगढ़ अभी दूर बहुत
दूर था। बाबा के
आश्रम से निकलते
ही अचानक
राजकुमार को उस
राजकन्या का ध्यान
आया, जिसे उसने वृक्ष
की जड़ से रोगमुक्त
किया था। राजा ने
उससे आग्रह
किया था कि वह
उनकी घोषणा के
अनुसार
पुत्री का वरण करे
और उनका आधा राज्य
ले ले। राजकुमार ने
अपने घोड़े
को उसी नगर की ओर
मोड़ दिया और कुछ
ही समय में
राजकुमार और
पद्मिनी उस नगर में
पहुंच गए।
राजा राजकुमार के
आगमन से बहुत
आनन्दित हुए और जब
उन्होंने
पद्मिनी को देखा उन
गदगद् हो गया।
उन्होंने राजकुमार
और पद्मिनी का पूरे
सम्मान के साथ
स्वागत किया।
राजा ने राजकुमार से
राजकुमारी को साथ
ले जाने का अनुरोध
किया तो राजकुमार
ने सहर्ष स्वीकार कर
लिया, लेकिन जब
राजा ने
अपना आधा राज्य देने
का प्रस्ताव
किया तो राजकुमार
ने उसे लेने में
असमर्थता प्रकट
की। राजकुमार ने एक
दिन वहां ठहर कर
राजा का आतिथ्य
स्वीकार किया और
अगले दिन
पद्मिनी और
राजकुमारी को साथ
लेकर राजगढ़ की ओर
रवाना हो गया।
उनका अगला पड़ाव
अब भभूत वाले
बाबा के यहां था।
मेहमानों का काफिल
उसी ओर बढ़
रहा था। सूर्य
की बाल-किरणें सारे
वातावरण
को बड़ी स्निग्धता प्
कर रही थीं। आकाश
निर्मल था।
पक्षी कलरव कर रहे
थे। सबके मन उमंग से
भरे थे। उन्हें राजगढ़
पहुंचने की जल्दी थी,
पर मार्ग के अनुपम
दूश्य उनके पैरों में
जंजीर डाल रहे थे।
पर्वत श्रृंखला पार
करते हुए तो वे इतने
अभिभूत हुए
कि घोड़ों पर से उतर
पड़े और उपत्यकाओं
की हरियाली तथा प
शिखरों पर
सुहावनी धूप
की सुनहरी चादर
देखकर सबके मन आनंद
से उछलने लगे।
पद्मिनी ने
प्रकृति की उस
छटा का जी-भर कर
पान करते हुए
राजकुमार का हाथ
पकड़ लिया। बोली,
“राजकुमार,
आदमी अगर
इतना ऊंचा उठ जाये,
इतना निर्मल
हो जाये
तो धरती पर स्वर्ग
उतर आये।” एक
अलौकिक आभा से
पद्मिनी का मुख-
मुण्डल दीप्त
हो रहा था। उसे
देखकर
ऐसा लगता था जैसे
इंद्रलोक की कोई
देवांगना इस
धरती पर आ गई हो।
वह
मुस्कराती थी तो प्य
के धवल निर्झर बहने
लगते थे। वह
हंसती थी तो सारी
पुष्पों से आच्छादित
हो उठती थी। बड़े
स्नेह से भीग कर
राजकुमार बार-बार
उस कोमलांगी की ओर
देखता था। उस
अनमोल
सम्पदा को पाकर वह
बार-बार अपने
भाग्य
को सराहता था। उसे
लगा, पर्वतों के
उतार-चढ़ाव से
पद्मिनी थक
जायेगी। किन्तु
पद्मिनी तो रुकने
का नाम ही नहीं ले
रही थी। उसने भावुक
होकर कहा,
“पद्मिनी तुम अब
घोड़े पर बैठ जाओ।
तुम्हारे पैर दर्द करने
लगेंगे।” पद्मिनी ने
बड़े उल्लास से कहा,
“क्यों तुम मुझे इस
आनंद से वंचित
करना चाहते हो?”
उसके इस उद्गार से
ऊंचे-ऊंचे पर्वत शिखर
निहाल हो गये,
उपत्यकाएं
मुस्करा उठीं और घने
गगनचुम्बी वृक्षों की
गहरी हो गई। जाते
समय राजकुमार ने वह
पर्वत-
माला बिना इधर-
उधर देखे योंही पार
कर ली थी, किन्तु
आज तो उसके साथ एक
ऐसा प्रकाशपुंज था,
जिसके आलोक में
भीतर-बाहर
कहीं भी अंधकार रह
नहीं सकता था। वे
लोग घोड़ों पर सवार
हो गये।
पर्वतों को लांघ कर
फिर मैदान में आ गये।
राजकुमार ने हंसकर
कहा, “हम लोग
भी कैसे हैं,
जहां घोड़ों पर
बैठना चाहिए था,
वहां बैठे नहीं, लेकिन
जहां पैदल चल सकते
थे, वहां घोड़ों पर
सवार हो गये हैं।”
पद्मिनी यह सुनकर
चुप न रह सकी।
बोली, “राजकुमार
आदमी पैदल चलता है
तो धरती को उसका
जाता है। पहाड़ों में
पैदल न
चलना पहाड़ों का अप
करना है।”
पद्मिनी की इस
बुद्धिमत्ता से
राजकुमार का रोम-
रोम पुलकित
हो उठा। वह क्षण
भर उसकी ओर
देखता रह गया।
बाबा का आश्रम अब
दूर नहीं था।
राजकुमार ने कहा,
“पद्मिनी, अब हम
उन बाबा के आश्रम में
पहुंच रहे हैं, जिन्होंने
मुझे एक
ऐसी चमत्कारी भभूत
दी थी, जिसे खाकर
मुझे कोई नहीं देख
सकता था और मैं
सबको देख
सकता था।” फिर कुछ
रुककर बोला,
“उसी भभूत को मुंह में
डालकर मैंने तुम्हारे
सिंहल द्वीप में प्रवेश
किया था।”
पद्मिनी ने कहा,
“तो तुम मेरे महल में
भी आये होंगे।”
“नहीं।” राजकुमार
बोला, “मैंने तुम्हारे
महल को बाहर से
देखा था।” “भीतर
क्यों नहीं आये?”
राजकुमारी ने
थोड़ा व्यग्र होकर
पूछा। “महल में
जाना चाहता था,
लेकिन जाने
क्या सोचकर मुझे डर
लगा। फाटक बंद था।
खोलने की हिम्मत
नहीं हुई। नगर
का एक चक्कर लगाकर
लौट आया। तभी मुझे
अचानक ध्यान
आया कि मैं अद्दश्य
तो हो गया हूं, पर
अपने असली रूप में कैसे
आऊंगा? जब मैं इस
चिन्ता में
डूबा था कि यही बा
आ खड़े हुए। मैंने उन्हें
अपनी चिन्ता बताई
तो उन्होंने भभूत
की एक डिब्बी और
दी और कहा कि इसे
खाओगे तो अपने
असली रूप में आ
जाओगे। यह कहकर
बाबा अंतर्धान
हो गये।”
पद्मिनी यह सुनकर
हंस पड़ी।

Saturday, 17 December 2011

कुएं का विवाह

एक बार राजा कॄष्णदेव
राय और तेनालीराम के
बीच किसी बात
को लेकर विवाद
हो गया। तेनालीराम
रुठकर चले गए। आठ-दस
दिन बीते,
तो राजा का मन
उदास हो गया।
राजा ने तुरन्त
सेवको को तेनालीराम
को खोजने भेजा।
आसपास का पूरा क्षेत्र
छान लिया पर
तेनालीराम
का कहीं अता-
पता नहीं चला।
अचानक राजा को एक
तरकीब सूझी। उसने
सभी गांवों में
मुनादी कराई
राजा अपने राजकीय
कुएं का विवाह
रचा रहे हैं, इसलिए
गांव के
सभी मुखिया अपने-अपने
गांव के कुओं को लेकर
राजधानी पहुंचे।
जो आदमी इस
आज्ञा का पालन
नहीं करेगा, उसे
जुर्माने में एक हजार
स्वर्ण मुद्राएं
देनी होंगी।
मुनादी सुनकर
सभी परेशान हो गए।
भला कुएं भी कहीं लाए-
ले जाए जा सकते हैं।
जिस गांव में
तेनालीराम भेष
बदलकर रहता था,
वहां भी यह
मुनादी सुनाई दी।
गांव
का मुखिया परेशान
था। तेनालीराम समझ
गए कि उसे खोजने के
लिए ही महाराज ने
यह चाल चली हैं।
तेनालीराम ने
मुखिया को बुलाकर
कहा “मुखियाजी, आप
चिंता न करें, आपने मुझे
गांव में आश्रय दिया हैं,
इसलिए आपके उपकार
का बदला में चुकाऊंगा।
मैं एक तरकीब
बताता हूं आप आसपास
के मुखियाओं
को इकट्ठा करके
राजधानी की ओर
प्रस्थान करें”। सलाह
के अनुसार
सभी राजधानीकी ओर
चल दिए। तेनालीराम
भी उनके साथ थे।
राजधानी के बाहर
पहुंचकर वे एक जगह पर
रुक गए। एक
आदमी को मुखिया का
संदेश देकर राजदरबार
में भेजा। वह
आदमी दरबार में
पहुंचा और तेनालीराम
की राय के अनुसार
बोला “महाराज!
हमारे गांव के कुएं
विवाह में शामिल होने
के लिए राजधानी के
बाहर डेरा डाले हैं। आप
मेहरबानी करके
राजकीय कुएं
को उनकी अगवानी के
लिए भेजें, ताकि हमारे
गांव के कुएं ससम्मान
दरबार के सामने
हाजिर हो सकें।
राजा को उनकी बात
समझते देर
नहीं लगी कि ये
तेनालीराम
की तरकीब हैं। राजा ने
पूछा सच-सच बताओ
कि तुम्हें यहाक्ल किसने
दी हैं? राजन! थोडे
दिन पहले हमारे गांव
में एक परदेशी आकर
रुका था। उसी ने हमें
यह तरकीब बताई हैं
आगंतुक ने जवाब दिया।
सारी बात सुनकर
राजा स्वयं रथ पर
बैठकर राजधानी से
बाहर आए और ससम्मान
तेनालीराम
को दरबार में वापस
लाए। गांव
वालो को भी पुरस्कार
देकर विदा किया।

Friday, 9 December 2011

भगवान पर भरोसा

जाड़े का दिन था और शाम
हो गयी थी। आसमान में
बादल छाये थे। एक नीम के पेड़
पर बहुत-से कौए बैठे थे। वे सब
बार-बार काँव-काँव कर रहे
थे और एक-दूसरे से झगड़ भी रहे
थे। इसी समय एक
छोटी मैना आयी और
उसी नीम के पेड़ की एक डाल
पर बैठ गयी। मैना को देखते
ही कई कौए उस पर टूट पड़े।
बेचारी मैना ने कहा—‘बादल
बहुत हैं, इसलिए आज
जल्दी अँधेरा हो गया है। मैं
अपना घोसला भूल गयी हूँ।
मुझे आज रात यहाँ रहने दो।’
कौओं ने कहा—‘नहीं, यह
हमारा पेड़ है। तू यहाँ से भाग
जा।’
मैना बोली—‘पेड़ तो सब
भगवान् के हैं। इस सर्दी में
यदि वर्षा हुई ओले पड़े
तो भगवान् ही हम लोगों के
प्राण बचा सकते हैं। मैं बहुत
छोटी हूँ, तुम्हारी बहिन हूँ,
मुझ पर तुम लोग दया करो और
मुझे भी यहाँ बैठने दो।’
कौओं ने कहा—‘हमें तेरी-
जैसी बहिन नहीं चाहिये। तू
बहुत भगवान् का नाम लेती है
तो भगवान् के भरोसे यहाँ से
चली क्यों नहीं जाती ? तू
नहीं जायगी तो हम सब तुझे
मारेंगे।’
कौए तो झगड़ालू होते ही हैं,
वे शाम को जब पेड़ पर बैठने
लगते हैं तब आपस में झगड़ा किये
बिना उनसे रहा नहीं जाता।
वे एक-दूसरे को मारते हैं और
काँव-काँव करके झगड़ते हैं।
कौन कौआ किस टहनी पर
रात को बैठेगा यह कोई
झटपट तै नहीं हो जाता।
उनमें बार-बार लड़ाई
होती है, फिर
किसी दूसरी चिड़िया को वे
अपने पेड़ पर तो बैठने ही कैसे
दे सकते थे। आपस की लड़ाई
छोड़कर वे मैना को मारने
दौड़े।
कौओं को काँव-काँव करके
अपनी ओर झपटते देखकर
बेचारी मैना वहाँ से उड़
गयी और थोड़ी दूर जाकर एक
आम के पेड़ पर बैठ गयी।
रात को आँधी आयी। बादल
गरजे और बड़े-बड़े ओले पड़ने लगे।
बड़े आलू-जैसे ओले तड़-तड़, भड़-
भड़ बंदूक की गोली-जैसे पड़ रहे
थे। कौए काँव-काँव करते
चिल्लाये; इधर-से-उधर
थोड़ा-बहुत उड़े; परंतु ओले
की मार से सब-के-सब घायल
होकर जमीन पर गिर पड़े।
बहुत-से कौए मर गये।
मैना जिस आम पर बैठी थी,
उसकी एक मोटी डाल आँधी में
टूट गयी। डाल भीतर से सड़
गयी थी और
पोली हो गयी थी। डाल
टूटने पर उसकी जड़ के पास पेड़
में एक खोंड़र हो गया।
छोटी मैना उसमें घुस गयी।
उसे एक भी ओला नहीं लगा।
सबेरा हुआ, दो घड़ी चढ़ने पर
चमकीली धूप निकली।
मैना खोंड़र में से निकली, पंख
फैलाकर चहककर उसने भगवान्
को प्रणाम किया और वह
उड़ी।
पृथ्वी पर ओले से घायल पड़े हुए
कौए ने मैना को उड़ते देखकर
बड़े कष्ट से
कहा—‘मैना बहिन ! तुम
कहाँ रही ?
तुमको ओलों की मार से किसने
बचाया ?’
मैना बोली—‘मैं आम के पेड़ पर
अकेली बैठी थी और भगवान्
की प्रार्थना करती थी।
दुःख में पड़े हुए असहाय
जीवको भगवान् के सिवा और
कौन बचा सकता है।’
लेकिन भगवान् केवल ओले से
ही नहीं बचाते और केवल
मैना को ही नहीं बचाते।
जो भी भगवान् पर
भरोसा करता है और भगवान्
को याद करता है, उसे भगवान्
सभी आपत्ति-विपत्ति में
सहायता देते हैं और
उसकी रक्षा करते हैं।

भला आदमी

एक धनी पुरुष ने एक मन्दिर
बनवाया। मन्दिर में भगवान्
की पूजा करने के लिये एक
पुजारी रखा। मन्दिर के
खर्चके लिये बहुत-सी भूमि, खेत
और बगीचे मन्दिर के नाम
लगाये। उन्होंने ऐसे प्रबन्ध
किया था कि जो मन्दिर में
भूखे, दीन-दुःखी या साधु-संत
आवें, वे वहाँ दो-चार दिन
ठहर सकें और उनको भोजन के
लिये भगवान् का प्रसाद
मन्दिर से मिल जाया करे।
अब उन्हें एक ऐसे मनुष्य
की आवश्यकता हुई जो मन्दिर
की सम्पत्ति का प्रबन्ध करे
और मन्दिर के सब
कामोंको ठीक-ठीक
चलाता रहे।
बहुत-से लोग उस धनी पुरुष के
पास आये। वे लोग जानते थे
कि यदि मन्दिर
की व्यवस्था का काम मिल
जाय तो वेतन अच्छा मिलेगा।
लेकिन उस धनी पुरुषने
सबको लौटा दिया। वह सबसे
कहता था—‘मुझे
भला आदमी चाहिये, मैं
उसको अपने-आप छाँट लूँगा।’
बहुत-से लोग मन-ही-मन उस
धनी पुरुष को गालियाँ देते
थे। बहुत लोग उसे मूर्ख
या पागल बतलाते थे। लेकिन
वह धनी पुरुष किसी की बात
पर ध्यान नहीं देता था। जब
मन्दिर के पट खुलते थे और लोग
भगवान् के दर्शन के लिए आने
लगते थे तब वह धनी पुरुष अपने
मकानकी छत पर बैठकर
मन्दिर में आनेवाले
लोगों को चुपचाप
देखा करता था।
एक दिन एक मनुष्य मन्दिर में
दर्शन करने आया। उसके कपड़े
मैले और फटे हुए थे। वह बहुत
पढ़ा-लिखा भी नहीं जान
पड़ता था। जब वह भगवान्
का दर्शन करके जाने लगा तब
धनी पुरुष ने उसे अपने पास
बुलाया और कहा—‘क्या आप
इस मन्दिर
की व्यवस्था सँभालने का काम
स्वीकार करेंगे ?’
वह मनुष्य बड़े आश्चर्य में पड़
गया। उसने कहा—‘मैं तो बहुत
पढ़ा-लिखा नहीं हूँ। मैं इतने
बड़े मन्दिर का प्रबन्ध कैसे
कर सकूँगा ?’
धनी पुरुषने कहा—मुझे बहुत
विद्वान नहीं चाहिये। मैं
तो एक भले आदमी को मन्दिर
का प्रबन्धक
बनाना चाहता हूँ।’
उस मनुष्य ने कहा—‘आपने इतने
मनुष्यों में मुझे
ही क्यों भला आदमी माना ?’
धनी पुरुष बोला—‘मैं
जानता हूँ कि आप भले
आदमी हैं। मन्दिर के रास्ते में
एक ईंटका टुकड़ा गड़ा रह
गया था और
उसका कोना ऊपर
निकला था। मैं इधर बहुत
दिनों से देखता था कि उस ईंट
के टुकड़े की नोक से
लोगों को ठोकर लगती थी।
लोग गिरते थे, लुढ़कते थे और
उठकर चल देते थे। आपको उस
टुकड़े से ठोकर लगी नहीं; किंतु
आपने उसे देखकर ही उखाड़ देने
का यत्न किया। मैं देख
रहा था कि आप मेरे मजदूर से
फावड़ा माँगकर ले गये और उस
टुकड़े को खोदकर आपने
वहाँ की भूमि भी बराबर कर
दी।’
उस मनुष्य ने कहा—यह
तो कोई बात नहीं है। रास्ते
में पड़े काँटे, कंकड़ और ठोकर
लगने योग्य पत्थर,
ईंटों को हटा देना तो प्रत्येक
मनुष्य का कर्तव्य है।’
धनी पुरुषने कहा—‘अपसे
कर्तव्यको जानने और पालन
करनेवाले लोग ही भले
आदमी होते है।’
वह मनुष्य मन्दिर
का प्रबन्धक बन गया। उसने
मन्दिर का बड़ा सुन्दर
प्रबन्ध किया।

Wednesday, 7 December 2011

राज्य की शोभा

एक राज्य
का राजा बेहद
कठोर और
जिद्दी था। वह
एक बार
जो निर्णय ले
लेता था, उसे
बदलने
को तैयार
नहीं होता था।
एक बार उसने
प्रजा पर
भारी कर
लगाने
की योजना मंत्री
के सामने रखी।
मंत्रियों को यह
प्रस्ताव
अन्यायपूर्ण
लगा। उसने इससे
अपनी असहमति
राजा क्रोधित
हो उठा। उसने
मंत्रिपरिषद
को समाप्त
करने
का फैसला किया
यही नहीं, उसने
सारे
मंत्रियों के देश
निकाले
का आदेश दे
दिया।
मंत्री घबराए।
वे समझ
नहीं पा रहे थे
कि इस
स्थिति का सामना कैसे
किया जाए।
तभी उन्हें
विक्रम नाई
की याद आई।
वह
राजा का प्रिय नाईँ
था। उसने पहले
भी कई
मौकों पर
राजा का क्रोध
शांत किया था।
उसे
बुलाया गया।
मंत्रियों ने उसे
सारी स्थिति उसे बताई
और
प्रार्थना की
ऐसा कुछ करे
जिससे
राजा को सद्बुद्धि प्राप्त हो
विक्रम ने यह
चुनौती स्वीकार
कर ली। वह
राजा के पास
उनके नाखून
काटने गया।
राजा ने
अपनी अंगुलियां
कर दीं।
विक्रम ने
नखों पर गुलाब
जल छिड़का और
धीरे-धीरे नख
काटने लगा।
फिर उसने कहा,
‘महाराज,
शरीर में इन
नखों की आवश्यकता क्या है
वे बढ़ते रहते हैं
और उन्हें बार-
बार
काटना पड़ता
इनमें रोगों के
कीटाणु
भी रहते हैं।
क्यों न इन्हें जड़
से उखाड़ कर फेंक
दिया जाए?’
राजा ने
मुस्कराते हुए
कहा, ‘वो तो है,
लेकिन इन्हें
उखाड़कर मत
फेंक देना। ये
तो हाथ-
पैरों की शोभा
भले
ही इनका
उपयोग न हो,
पर ये आभूषण
तुल्य हैं।’ इस पर
विक्रम ने कहा,
‘महाराज
रोगों का घर
होते हुए भी ये
हाथ-
पैरों की शोभा
ठीक उसी तरह
मंत्रिपरिषद
राज्य
की शोभा है।
मंत्री भले
ही आपके
किसी कार्य
का विरोध करें,
पर
आपकी शोभा
है।’
यह सुनते
ही राजा को अपनी भूल
ज्ञात हुई। विक्रम ने
विनम्रतापूर्व
कहा, ‘राज्य
की सेवा में
उनका महत्वपूर्ण योगदान है।
उनके बगैर
राज्य
बिना नखों के
हाथ की तरह
हो जाएगा।’
राजा समझ
गया। उसने
अपना आदेश
वापस लेकर
मंत्रियों को फिर
से
उनका दायित्व
सौंप दिया।

Tuesday, 6 December 2011

धर्म

मल्लू
और गल्लू सियार
भाई-भाई थे। मल्लू
सीधा-सादा और
भोला था। वह
बड़ा ही नेकदिल और
दयावान था।
दूसरी ओर गल्लू एक
नम्बर का धूर्त और
चालबाज सियार
था। वह
किसी भी भोले-भाले
जानवर
को अपनी चालाकी से
बहलाकर
उसका काम तमाम
कर देता था।
एक दिन गल्लू
सियार जंगल में घूम
रहा था कि उसे
रास्ते में एक चादर
मिली। जाड़े के दिन
नज़दीक थे इसीलिए
उसने चादर
को उठाकर रख
लिया। उसके बाद
वह घर की ओर चल
दिया।
अगले दिन गल्लू
सियार मल्लू के घर
गया। ठण्ड की वजह
से
दरवाजा खोला लेकिन
जैसे ही गल्लू अन्दर
जाने लगा, तो मल्लू
ने दरवाजा बन्द कर
लिया। गल्लू
को अपने भाई की यह
हरकत बहुत
बुरी लगी। उसे अपने
भाई पर बड़ा क्रोध
आया।
भाई के घर से आने के
बाद गल्लू नहाने के
लिए नदी पर गया।
उसको देखकर
बड़ा आश्चर्य
हो रहा था कि आज
सारे मोटे-मोटे
जानवर बड़े बेफिक्र
होकर
बिना किसी डर के
उसके पास से गुजर रहे
थे। उसके पानी में
घुसने से पहले जैसे
ही चादर
को उतारा, उसके
आश्चर्य
का ठिकाना न
रहा। सारे छोटे-
मोटे जानवर अपनी-
अपनी जान बचाने के
लिए इधर-उधर
भागने लगे।
चारों ओर
हाहाकार मच गया।
गल्लू
को लगा कि जरूर इस
चादर का चमत्कार
है। उसके मन में
विचार
आया कि कहीं यह
जादुई तो नहीं।
जिसको ओढ़ते ही वह
अदृश्य
हो जाता हो।
तभी उसे याद
आया कि मल्लू ने
भी दरवाजा खटखटाने
की आवाज सुनकर
दरवाजा खोला और
एकाएक बन्द भी कर
लिया,
मानो दरवाजे पर
कोई हो ही नहीं।
अब उसका शक यकीन
में बदल गया और उसे
मल्लू पर किसी तरह
का क्रोध
भी नहीं रहा। वह
नहाकर जल्दी से
जल्दी अपने भाई
मल्लू सियार के पास
पहुँचना चाहता था।
अत: लम्बे डग
भरता हुआ उसके घर
जा पहुँचा। उसने
मल्लू को वह चादर
दिखाई और प्रसन्न
होते हुए बोला --
"देखो भाई, इस
जादुई चादर
को ओढ़ते ही ओढ़ने
वाला अदृश्य
हो जाता है। मैंने
सोच है कि क्यों न
इसकी मदद से मैं जंगल
के राजा को मारकर
खुद जंगल
का राजा बन जाऊँ।
अगर तुम मेरा साथ
दोगे तो मैं तुम्हें
महामंत्री का पद
दूंगा।
"भाई गल्लू, मुझे
महामंत्री पद
का कोई लालच
नहीं। यदि तुम मुझे
राजा भी बना दोगे
तो भी मैं
नहीं बनूँगा क्योंकि अपने
स्वामी से
गद्दारी में नहीं कर
सकता। मैं तो तुम्हें
भी यही सलाह
दूंगा कि तुम्हें इस
चादर का दुरूपयोग
नहीं करना चाहिए।"
"अपनी सलाह अपने
पास ही रखो। मैं
भी कितना मूर्ख हूँ
जो इस काम में
तुम्हारी सहायता लेने
की सोच बैठा," गुस्से
में भुनभुनाते हुए गल्लू
सियार वहाँ से
चला गया पर मल्लू
सोच में डूब गया।
"अगर गल्लू जंगल
का राजा बन
बैठा तब तो अनर्थ
हो जाएगा। एक
सियार को जंगल
का राजा बना देखकर
पड़ोसी राजा हम
पर आक्रमण कर
देगा।
शक्तिशाली राजा के
अभाव में हम अवश्य
ही हार जायेंगे और
हमारी स्वतंत्रता खतरे
में पड़ जाएगी। यह
सोच कर मल्लू
सियार सिहर
उठा और उसने मन
ही मन गल्लू की चाल
को असफल बनाने
की एक
योजना बना डाली।
रात के समय जब सब
सो रहे थे तब मल्लू
अपने घर से
निकला और चुपचाप
खिड़की के रास्ते
गल्लू के मकान में घुस
गया। उसने
देखा कि गल्लू
की चादर उसके पास
रखी हुई है। उसने
बड़ी ही सावधानी से
उसको उठाया और
उसके स्थान पर
वैसी ही एक अन्य
चादर रख
दी जो कि बिल्कुल
वैसी थी। इसके बाद
वह अपने घर आ गया।
सुबह उठकर नहा-
धो कर गल्लू सियार
शेर को मारने के लिए
चादर ओढ़कर
प्रसन्नतापूर्वक
उसकी माँद की ओर
चल पड़ा। आज उसके
पाँव धरती पर
नहीं पड़ रहे थे।
आखिर वह अपने
को भावी राजा समझ
रहा था। माँद में
पहुँचकर उसने
देखा कि शेर
अभी सो रहा था।
गल्लू ने गर्व से
उसको एक लात
मारी और
उसको जगा कर
गालियाँ देने लगा।
शेर चौंक कर उठ
गया। वह
भूखा तो था ही,
उपर से गल्लू ने
उसको क्रोध
भी दिलाया था,
सो उसने एक ही बार
में गल्लू का काम
तमाम कर दिया।
मल्लू सियार को जब
अपने भाई की यह
खबर
मिली तो उसको बड़ा दुख
हुआ पर उसने
सोचा कि इसके
अलावा जंगल
की स्वतंत्रता को बचाने
का कोई
रास्ता भी तो नहीं था।
उसकी आँखों में आँसू आ
गए, वह उठा और
उसने उस जादुई
चादर
को जला डाला ताकि वह
किसी और के हाथ में
न पड़ जाए।
मल्लू ने अपने भाई
की जान देकर अपने
राजा के प्राण
बचाए थे और जंगल
की स्वतंत्रता भी।

गरम जामुन

बहुत
समय
पहले की बात है,
सुंदरवन में श्वेतू
नामक एक
बूढ़ा खरगोश
रहता था। वह
इतनी अच्छी कविता लिखता था कि सारे
जंगल के
पशु्पक्षी उन्हें
सुनकर दातों तले
उँगली दबा लेते और
विद्वान तोता तक
उनका लोहा मानता था।
श्वेतू खरगोश ने
शास्त्रार्थ में
सुरीली कोयल और
विद्वान मैना तक
को हरा कर विजय
प्राप्त की थी।
इसी कारण जंगल
का राजा शेर
भी उसका आदर
करता था। पूरे
दरबार में उस
जैसा विद्वान कोई
दूसरा न था। धीरे-
धीरे उसे
अपनी विद्वत्ता का बड़ा घमण्ड
हो गया।
एक दिन वह बड़े सवेरे
खाने की तलाश में
निकला। बरसात के
दिन थे, काले
बादलों ने
घिरना शुरू
ही किया था।
मौसम
की पहली बरसात
होने ही वाली थी।
सड़क के किनारे
जामुनों के पेड़ काले-
काले जामुनों से भरे
झुके हुए थे। बड़े-बड़े,
काले, रसीले
जामुनों को देखकर
श्वेतू के मुँह में
पानी भर आया।
एक बड़े से जामुन के
पेड़ के नीचे जाकर
उसने आँखें उठाई और
ऊपर देखा तो नन्हें
तोतों का एक झुण्ड
जामुन
खाता दिखाई
दिया। बूढ़े खरगोश
ने नीचे से आवाज़ दी,
"प्यारे नातियों मेरे
लिये भी थोड़े से
जामुन गिरा दो।"
उन नन्हें तोतों मे
मिठ्ठू नाम का एक
तोता बड़ा शरारती और
चंचल था। वह ऊपर से
ही बोला,
'दादा जी, यह
तो बताइये कि आम
गरम जामुन खायेंगे
या ठंडी?"
बेचारा बूढ़ा श्वेतू
खरगोश हैरान
होकर बोला,
"भला जामुन
भी कहीं गरम होते
हैं? चलो मुझसे मज़ाक
न करो। मुझे थोड़े से
जामुन तोड़ दो।"
मिठ्ठू बोला, "अरे
दादाजी, आप ठहरे
इतने बड़े विद्वान।
यह भी नहीं जानते
कि जामुन गरम
भी होते हैं और ठंडे
भी। पहले आप
बताइये
कि आपको कैसे जामुन
चाहिये? भला इसे
जाने बिना मैं
आपको कैसे जामुन
दूँगा?"
बूढ़े और विद्वान
खरगोश की समझ में
बिलकुल भी न
आया कि जामुन गरम
भला कैसे होंगे? फिर
भी वह उस रहस्य
को जानना चाहता था इसलिये
बोला, "बेटा, तुम मुझे
गरम जामुन
ही खिलाओ ठंडे
तो मैंने बहुत खाए
हैं।"
नन्हें मिठ्ठू ने बूढ़े
श्वेतू की यह बात
सुनकर जामुन की एक
डाली को ज़ोर से
हिलाया। पके-पके
ढेर से जामुन नीचे धूल
में बिछ गये।
बूढ़ा श्वेतू उन्हें
उठाकर धूल फूँक-फूँक
कर खाने लगा। यह
देखकर नन्हें मिठ्ठू ने
पूछा,
"क्यों दादाजी,
जामुन खूब गरम हैं
न?"
"कहाँ बेटा? मैं
तो साधारण ठंडे
जामुन ही हैं।"
खरगोश बोला। नन्हें
मिठ्ठू तोते ने चौंक
कर पूछा,
"क्या कहा ठंडे हैं?
तो फिर आप इन्हें
फूँक-फूँक कर
क्यों खा रहे हैं? इस
तरह तो सिर्फ गरम
चीजें ही खाई
जाती है।"
नन्हें मिठ्ठू तोते
की बात का रहस्य
अब जाकर बूढ़े
खरगोश की समझ में
आया और वह
बड़ा शर्मिन्दा हुआ।
इतना विद्वान
बूढ़ा श्वेतू खरगोश
जरा सी बात में छोटे
से तोते के बच्चे से
हार गया था।
उसका घमण्ड दूर
हो गया और उसने एक
कविता लिखी -
खूब कड़ा तना शीशम
का, बड़े कुल्हाड़े से
कट जाता।
लेकिन
वो ही बड़ा कुल्हाड़ा,
कोमल केले से घिस
जाता।
सच है कभी-
कभी छोटे भी,
ऐसी बड़ी बात कहते
हैं।
बहुत बड़े विद्वान
गुणी भी, अपना सिर
धुनने लगते हैं।

और चाँद फूट गया

आशीष और रोहित के
घर आपस में मिले हुए
थे। रविवार के दिन
वे दोनों बड़े सवेरे
उठते ही बगीचे में आ
पहुँचे।
" तो आज कौन सा खेल
खेलें ?" रोहित ने
पूछा। वह छह वर्ष
का था और
पहली कक्षा में
पढ़ता था।
"कैरम से तो मेरा मन
भर गया। क्यों न हम
क्रिकेट खेलें ?" आशीष
ने कहा। वह
भी रोहित के साथ
पढ़ता था।
"मगर उसके लिये
तो ढेर सारे
साथियों की ज़रूरत
होगी और
यहाँ हमारे तुम्हारे
सिवा कोई है
ही नहीं।" रोहित
बोला।
वे कुछ देर तक सोचते
रहे फिर आशीष ने
कहा, "चलो गप्पें
खेलते हैं।"
"गप्पें? भ़ला यह
कैसा खेल होता है?"
रोहित को कुछ
भी समझ में न आया।
"देखो मैं बताता हूँ
आ़शीष ने कहा, "हम
एक से बढ़ कर एक
मज़ेदार गप्प हाँकेंगे।
ऐसी गप्पें जो कहीं से
भी सच न हों।
बड़ा मज़ा आता है इस
खेल में। चलो मैं ही शुरू
करता हूँ यह
जो सामने अशोक
का पेड़ है ना रात में
बगीचे के तालाब
की मछलियाँ इस पर
लटक कर झूला झूल
रही थीं। रंग
बिरंगी मछलियों से
यह पेड़
ऐसा जगमगा रहा था मानो लाल
परी का राजमहल।"
अच्छा! रोहित ने
आश्चर्य से कहा, "और
मेरे बगीचे में
जो यूकेलिप्टस
का पेड़ है ना इ़स पर
चाँद सो रहा था।
चारों ओर
ऐसी प्यारी रोशनी झर
रही थी कि तुम्हारे
अशोक के पेड़ पर
झूला झूलती मछलियों ने
गाना गाना शुरू कर
दिया।"
"अच्छा! कौन
सा गाना?" आशीष ने
पूछा।
"वही चंदामामा दूर
के पुए पकाएँ बूर के।"
रोहित ने जवाब
दिया।
"अच्छा! फिर
क्या हुआ?"
"फिर क्या होता,
मछलियाँ इतने ज़ोर
से
गा रही थीं कि चाँद
की नींद टूट गयी और
वह धड़ाम से मेरी छत
पर गिर गया।"
"फिर?"
"फिर क्या था, वह
तो गिरते ही फूट
गया।"
"हाय, सच! चाँद फूट
गया तो फिर उसके
टुकड़े कहाँ गये?"
आशीष ने पूछा।
वे तो सब सुबह-सुबह
सूरज ने आकर जोड़े और
उनपर काले रंग
का मलहम
लगा दिया।
विश्वास न
हो तो रात में देख
लेना चाँद पर काले
धब्बे ज़रूर दिखाई
देंगे।"
अच्छा ठीक है मैं रात
में देखने की कोशिश
करूँगा।" आशीष ने
कहा। वह एक
नयी गप्प सोच
रहा था।
"हाँ याद आया,
आशीष बोला,
"पिछले साल जब
तुम्हारे
पापा का ट्रांसफर
यहाँ नहीं हुआ
था तो एक दिन खूब
ज़ोरों की बारिश
हुई। इतनी बारिश
कि पानी बूँदों की बजाय
रस्से की तरह गिर
रहा था। पहले तो मैं
उसमें नहाया फिर
पानी का रस्सा पकड़
कर ऊपर चढ़ गया।
पता है
वहाँ क्या था?"
"क्या था?" रोहित
ने आश्चर्य से पूछा।
"वहाँ धूप खिली हुई
थी। धूप में नन्हें नन्हें
घर थे, इन्द्रधनुष के
बने हुए। एक घर के
बगीचे में सूरज आराम
से हरी-हरी घास
पर लेटा आराम कर
रहा था और नन्हंे-
नन्हें सितारे
धमाचौकड़ी मचा रहे
थे "
"सितारे
भी कभी धमाचौकड़ी मचा सकते
हैं?" रानी दीदी ने
टोंक दिया। न जाने
वो कब आशीष और
रोहित के पास आ
खड़ी हुई थीं और
उनकी बातें सुन
रही थीं।
"अरे दीदी, हम कोई
सच बात थोड़ी कह
रहे हैं।" रोहित ने
सफाई दी।
"अच्छा तो तुम झूठ
बोल रहे हो?"
रानी ने धमकाया।
"नहीं दीदी, हम
तो गप्पें खेल रहे हैं
और हम खुशी के लिये
खेल रहे हैं,
किसी का नुक्सान
नहीं कर रहे हैं।"
आशीष ने कहा।
"भला ऐसी गप्पें
हाँकने से
क्या फायदा जिससे
किसी का उपकार न
हो। मैने एक गप्प
हाँकी और
दो बच्चों का उपकार
भी किया।"
"वो कैसे ?"
दोनों बच्चों ने एक
साथ पूछा।
अभी अभी तुम
दोनों की मम्मियाँ तुम्हें
नाश्ते के लिये
बुला रही थीं। उन्हें
लगा कि तुम लोग
बगीचे में खेल रहे होगे
लेकिन मैने गप्प
मारी कि वे लोग
तो मेरे घर में बैठे
पढ़ाई कर रहे हैं।
उन्होंने मुझसे तुम
दोनों को भेजने के
लिये कहा हैं।
यह सुनते ही आशीष
और रोहित गप्पें भूल
कर अपने-अपने घर
भागे। उन्हें डर लग
रहा था कि मम्मी उनकी पिटाई
कर देंगी लेकिन
मम्मियों ने तो उन्हें
प्यार किया और
सुबह-सुबह पढ़ाई
करने के लिये
शाबशी भी दी।
रानी दीदी की गप्प
को वे सच मान
बैठी थीं

बेईमानी का फल

चारों ओर सुंदर वन में
उदासी छाई हुई
थी। वन को अज्ञात
बीमारी ने घेर
लिया था। वन के
लगभग सभी जानवर
इस बीमारी के
कारण अपने
परिवार का कोई न
कोई सदस्य गवाँ चुके
थे। बीमारी से
मुकाबला करने के
लिए सुंदर वन के
राजा शेर सिंह ने एक
बैठक बुलाई।
बैठक का नेतृत्व खुद
शेर सिंह ने किया।
बैठक में गज्जू हाथी,
लंबू जिराफ, अकड़ू
सांप, चिंपू बंदर,
गिलू गिलहरी, कीनू
खरगोश सहित
सभी जंगलवासियों ने
हिस्सा लिया। जब
सभी जानवर इकठ्ठे
हो गए, तो शेर सिंह
एक ऊँचे पत्थर पर बैठ
गया और
जंगलवासियों को संबोधित
करते हुए कहने लगा,
"भाइयो, वन में
बीमारी फैलने के
कारण हम अपने कई
साथियों को गवाँ चुके
हैं। इसलिए हमें इस
बीमारी से बचने के
लिए वन में एक
अस्पताल
खोलना चाहिए,
ताकि जंगल में
ही बीमार
जानवरों का इलाज
किया जा सके।'
इस पर
जंगलवासियों ने
एतराज जताते हुए
पूछा कि अस्पताल के
लिए पैसा कहाँ से
आएगा और अस्पताल
में काम करने के लिए
डॉक्टरों की जरूरत
भी तो पड़ेगी? इस
पर शेर सिंह ने कहा,
यह पैसा हम
सभी मिलकर
इकठ्ठा करेंगे।
यह सुनकर कीनू
खरगोश
खड़ा हो गया और
बोला, "महाराज!
मेरे दो मित्र
चंपकवन के अस्पताल
में डॉक्टर हैं। मैं उन्हें
अपने अस्पताल में ले
आऊँगा।'
इस फैसले
का सभी जंगलवासियों ने
समर्थन किया। अगले
दिन से ही गज्जू
हाथी व लंबू जिराफ
ने अस्पताल के लिए
पैसा इकठ्ठा करना शुरू
कर दिया।
जंगलवासियों की मेहनत
रंग लाई और
जल्दी ही वन में
अस्पताल बन गया।
कीनू खरगोश ने अपने
दोनों डॉक्टर
मित्रों वीनू
खरगोश और चीनू
खरगोश को अपने
अस्पताल में
बुला लिया।
राजा शेर सिंह ने तय
किया कि अस्पताल
का आधा खर्च वे स्वयं
वहन करेंगे और
आधा जंगलवासियों से
इकठ्ठा किया जाएगा।
इस प्रकार वन में
अस्पताल चलने लगा।
धीरे-धीरे वन में
फैली बीमारी पर
काबू
पा लिया गया।
दोनों डॉक्टर
अस्पताल में आने वाले
मरीजों की पूरी सेवा करते
और मरीज़ भी ठीक
हो कर
डाक्टरों को दुआएँ
देते हुए जाते। कुछ
समय तक सब कुछ ठीक
ठाक चलता रहा।
परंतु कुछ समय के बाद
चीनू खरगोश के मन में
लालच बढ़ने लगा।
उसने वीनू खरगोश
को अपने पास
बुलाया और कहने
लगा यदि वे
दोनों मिल कर
अस्पताल
की दवाइयाँ दूसरे
वन में बेचें तथा रात
में जाकर दूसरे वन के
मरीज़ों को देखें
तो अच्छी कमाई कर
सकते हें और इस बात
का किसी को पता भी नहीं लगेगा।
वीनू खरगोश
पूरी तरह से
ईमानदार था,
इसलिए उसे चीनू
का प्रस्ताव पसंद
नहीं आया और उसने
चीनू को भी ऐसा न
करने का सुझाव
दिया। लेकिन चीनू
कब मानने
वाला था। उसके
ऊपर तो लालच
का भूत सवार था।
उसने वीनू के सामने
तो ईमानदारी से
काम करने का नाटक
किया। परंतु चोरी-
छिपे बेइमानी पर
उतर आया। वह
जंगलवासियों की मेहनत
से खरीदी गई
दवाइयों को दूसरे
जंगल में ले जाकर बेचने
लगा तथा शाम
को वहाँ के
मरीजों का इलाज
करके कमाई करने
लगा।
धीरे-धीरे
उसका लालच
बढ़ता गया। अब वह
अस्पताल के कम, दूसरे
वन के
मरीजों को ज्यादा देखता।
इसके विपरीत,
डॉक्टर वीनू अधिक
ईमानदारी से काम
करता। मरीज
भी चीनू
की अपेक्षा डॉक्टर
वीनू के पास
जाना अधिक पसंद
करते। एक दिन
सभी जानवर
मिलकर राजा शेर
सिंह के पास चीनू
की शिकायत लेकर
पहुँचे। उन्होंने चीनू
खरगोश
की कारगुजारियों से
राजा को अवगत
कराया और उसे दंड
देने की माँग की। शेर
सिंह ने उनकी बात
ध्यान से सुनी और
कहा कि सच्चाई
अपनी आँखों से देखे
बिना वे कोई
निर्णय नहीं लेंगे।
इसलिए वे पहले चीनू
डॉक्टर की जांच
कराएँगे, फिर
अपना निर्णय देंगे।
जांच का काम
चालाक
लोमड़ी को सौंपा गया,
क्योंकि चीनू
खरगोश
लोमड़ी को नहीं जानता था।
लोमड़ी अगले
ही दिन से चीनू के
ऊपर नजर रखने
लगी। कुछ दिन उस
पर नज़र रखने के बाद
लोमड़ी ने उसे रंगे
हाथों पकड़ने
की योजना बनाई।
उसने इस
योजना की सूचना शेर
सिंह को भी दी,
ताकि वे समय पर
पहुँच कर सच्चाई
अपनी आँखों से देख
सकें। लोमड़ी डॉक्टर
चीनू के कमरे में गई
और कहा कि वह पास
के जंगल से आई है।
वहाँ के
राजा काफी बीमार
हैं, यदि वे
तुम्हारी दवाई से
ठीक हो गए,
तो तुम्हें मालामाल
कर देंगे। यह सुनकर
चीनू को लालच आ
गया। उसने
अपना सारा सामान
समेटा और लोमड़ी के
साथ दूसरे वन के
राजा को देखने के
लिए चल पड़ा। शेर
सिंह जो पास
ही छिपकर
सारी बातें सुन
रहा था, दौड़कर
दूसरे जंगल में घुस
गया और
निर्धारित स्थान
पर जाकर लेट गया।
थोड़ी देर बाद
लोमड़ी डॉक्टर
चीनू को लेकर
वहाँ पहुँची, जहाँ शेर
सिंह मुँह ढँककर
सो रहा था। जैसे
ही चीनू ने राजा के
मुँह से हाथ हटाया,
वह शेर सिंह
को वहाँ पाकर
सकपका गया और डर
से काँपने लगा। उसके
हाथ से
सारा सामान छूट
गया,
क्योंकि उसकी बेइमानी का सारा भेद
खुल चुका था। तब तक
सभी जानवर वहाँ आ
गए थे। चीनू खरगोश
हाथ जोड़कर
अपनी कारगुजारियों की माफी माँगने
लगा।
राजा शेर सिंह ने
आदेश दिया कि चीनू
की बेइमानी से
कमाई हुई
सारी संपत्ति अस्पताल
में मिला ली जाए और
उसे धक्के मारकर
जंगल से बाहर
निकाल दिया जाए।
शेर सिंह के
आदेशानुसार चीनू
खरगोश को धक्के
मारकर जंगल से
बाहर निकाल
दिया गया। इस
कार्रवाई
को देखकर
जंगलवासियों ने
जान
लिया कि ईमानदारी की हमेशा जीत
होती है

ईमानदारी

विक्की अपने स्कूल में
होने वाले
स्वतंत्रता दिवस
समारोह को ले कर बहुत
उत्साहित था। वह
भी परेड़ में हिस्सा ले
रहा था।
दूसरे दिन वह एकदम
सुबह जग गया लेकिन घर
में अजीब सी शांति थी।
वह दादी के कमरे में गया,
लेकिन वह दिखाई
नहीं पड़ी।
"माँ, दादीजी कहाँ हैं?"
उसने पूछा।
"रात को वह बहुत
बीमार हो गई थीं।
तुम्हारे पिताजी उन्हें
अस्पताल ले गए थे, वह
अभी वहीं हैं
उनकी हालत
काफी खराब है।
विक्की एकाएक उदास
हो गया।
उसकी माँ ने पूछा,
"क्या तुम मेरे साथ
दादी जी को देखने
चलोगे? चार बजे मैं
अस्पताल जा रही हूँ।"
विक्की अपनी दादी को
बहुत प्यार करता था।
उसने तुरंत कहा, "हाँ, मैं
आप के साथ चलूँगा।" वह
स्कूल और
स्वतंत्रता दिवस के
समारोह के बारे में सब
कुछ भूल गया।
स्कूल में स्वतंत्रता दिवस
समारोह बहुत
अच्छी तरह संपन्न
हो गया। लेकिन
प्राचार्य खुश नहीं थे।
उन्होंने ध्यान
दिया कि बहुत से छात्र
आज अनुपस्थित हैं।
उन्होंने दूसरे दिन
सभी अध्यापकों को
बुलाया और कहा, "मुझे
उन विद्यार्थियों के
नामों की सूची चाहिए
जो समारोह के दिन
अनुपस्थित थे।"
आधे घंटे के अंदर
सभी कक्षाओं के
विद्यार्थियों की सूची
उन की मेज पर थी।
कक्षा छे की सूची बहुत
लंबी थी। अत: वह पहले
उसी तरफ मुड़े।
जैसे ही उन्होंने कक्षा छे
में कदम रखे,
वहाँ चुप्पी सी छा गई।
उन्होंने कठोरतापूर्वक
कहा, "मैंने
परसों क्या कहा था?"
"यही कि हम सब
को स्वतंत्रता दिवस
समारोह में उपस्थित
होना चाहिए,"
गोलमटोल उषा ने जवाब
दिया।
"तब बहुत सारे बच्चे
अनुपस्थित क्यों थे?"
उन्होंने
नामों की सूची हवा में
हिलाते हुए पूछा।
फिर उन्होंने अनुपस्थित
हुए विद्यार्थियों के
नाम पुकारे, उन्हें
डाँटा और अपने डंडे से
उनकी हथेलियों पर मार
लगाई।
"अगर तुम लोग
राष्ट्रीय समारोह के
प्रति इतने लापरवाह
हो तो इसका मतलब
यही है कि तुम
लोगों को अपनी
मातृभूमि से प्यार
नहीं है। अगली बार अगर
ऐसा हुआ तो मैं तुम सबके
नाम स्कूल के रजिस्टर से
काट दूँगा।"
इतना कह कर वह जाने के
लिए मुड़े तभी विक्की आ
कर उन के सामने
खड़ा हो गया।
"क्या बात है?"
"महोदय,
विक्की भयभीत पर दृढ़
था, मैं
भी स्वतंत्रता दिवस
समारोह में अनुपस्थित
था, पर आप ने मेरा नाम
नहीं पुकारा।" कहते हुए
विक्की ने
अपनी हथेलियाँ
प्राचार्य महोदय के
सामने फैला दी।
सारी कक्षा साँस रोक
कर उसे देख रही थी।
प्राचार्य कई क्षणों तक
उसे देखते रहे।
उनका कठोर चेहरा नर्म
हो गया और उन के स्वर में
क्रोध गायब हो गया।
"तुम सजा के हकदार
नहीं हो, क्योंकि तुम में
सच्चाई कहने की हिम्मत
है। मैं तुम से कारण
नहीं पूछूँगा, लेकिन तुम्हें
वचन
देना होगा कि अगली
बार राष्ट्रीय
समारोह
को नहीं भूलोगे। अब तुम
अपनी सीट पर जाओ।
विक्की ने जो कुछ किया,
इसकी उसे बहुत खुशी थी।

एक नन्ही गुड़िया और परी की कहानी

ye kahani ek
nanhi si gudiya
ki hai
jo har waqt apne
sapno mai khoye
rehti thi
jiski duniya sirf
sapne the
wo din hota
chahe raat bas
sapno ke
sagar mai doobi
rehti
uske liye sapne
hi uske khilone
the
aur saheliya bhi
uske sapne
sahi mai soche
to
sapne hi uski
duniya ban
chuke the
shayad
use pariyo ki
kahaniyo par bhi
vishwas tha
aur use vishwas
tha
ki ek din uske
sapne pure
karne ke liye bhi
koi pari jarur
aayegi,,,,,,
aur ek din aisa
aaya……
ek pari jo har kisi
ke sapno ko
jankar khush
hoya karti thi
wo is nanhi si
gudiya ke sapno
ko
dekhkar hairaan
reh gayi,,,,,
ek choti si nanhi
si gudiya
aur aise sapne
……..
us pari ko
vishwas na
hua,,,,,
us pari ne kayi
bacho ke sapno
ko jana tha
jisme kayi
khilone mangte
the
koi ache
kapde ,to koi
mithaiya……..
par is nanhi si
gudiya ke sapne
hairan pareshan
kar gaye
unhe,,,,,,
tab ek din wo us
gudiya ke sapne
mai aayi
aur bola gudiya
rani kya chahti
ho tum
kya mai tumhe
khilone du ya
kapde
ya kuch aur achi
cheez,,,,,
tab wo gudiya
boli nahi pari
rani…
mujhe is duniye
se bachalo….
Mai is duniye ke
liye nahi bani,,,,,
Ye duniya bahut
bekar hai,,,,
Yahan par log
dusro ko dukh
dekar khush
hote hai
Yahan par kisi ki
muskurahat kisi
ki nafrat hoti hai
Yahan sab apne
liye jeete hai
Par mai aisi nahi
banna chahti,,,,
mujhe is duniye
se darr lagta hai,
mai ek apni alag
duniya banana
chahti hoon
jahan mai har
kisi ko
khushiyan de
pau
jahan mere
wajah se kisi ke
chehre par
udassi na aaye
tab pari rani ne
kaha,,,,
ki itni choti si
aankhon mai
itne bade
sapne..
tab gudiya rani
ne kaha
ki mai har kisi se
pyaar karna
chahti hoon,..
har kisi ke dil mai
pyaar basana
chahti hoon
har kisi ki
takleef apni
baton se
khatam kar dena
chahti hoon
tab pari rani ne
kaha,,,,,
ki gudiya rani
tune sach kaha
kit tu is duniye
ke liye nahi
bani,,,,,,
kyunki is duniya
mai sab apne
liye hi
khushiyan
mangte hai
kisi ko paisa
chahiye to kisi
ko apna ghar
par aaj mai tere
sapno se bahut
khush hui hoon
mai tujhe teri
alag duniya
dungi.jahan tujhe is
duniya ki burai
nahi chu payegi
tere muskurahat
sabke liye
muskurahat ban
jayegi
tu har kisi ke
dukh ko
khushiyon se
bhar degi
tu anmol hogi is
duniye ke liye
aur fir pari rani
ne apni jadu ki
chadi ghumai
aur use vardaan
ke roop mai uske
sapne de diye
jab us gudiya
rani apni sapno
se bahar aayi
tab usne
kaha,,,,,
ki pariyo ki
kahaniyan sach
mai sach hoti hai
aur sapne agar
sache ho
to wo jarur pure
hote hai
par kahani
yahan khatam
na hui
ek din wo gudiya
bahut pareshan
ho gayi
aur uski
pareshani pari
rani na dekh
payi
wo fir gudiya
rani ke paas aayi
aur poocha kya
hua gudiya rani
tab wo boli ki
aisa kyu hota
hai
ki kayi log jinhe
mai muskurahat
deti hoon
wo meri aankhon
mai aansoo de
jate hai
jinka dukh mai
kam karti hoon
wo mujhe hi
dukh de jate hai
tab pari rani boli
bitiya rani,,,,,har
koi anmol hire ko
parakh nahi
pata
agar tumhe aaj
kisi ne aansso
diye hai
aur tumse nata
toda hai
to usme tum
pareshan na ho
kyunki tumne
kuch nahi khoya
jo khoya usne
khoya hai
kyunki hire ki
chamak kabhi
kam nahi hoti
kayi log use
pather
samajhkar chod
jate hai
magar us hire ki
parakh jo kar
pata hai
wo hi uski
ehmiyat samajh
pata hai
bas tu apni is
duniye mai
khush reh,,
tab wo gudiya
rani boli
pari
rani,,,,,,aapka
saath hi
mujhe mere
sapno se juda
nahi hone dega
aur is tarah pari
rani aur nahi si
gudiya
aapas mai ek
pyare rishte mai
bandh gaye
tab pari rani ne
kaha
ki aaj mujhe apni
jadu ki chadi se
bhi bada
ek anmol hira mil
gaya hai,,,,,,,,,,,,,,,
aur us gudiye
rani ne kaha
ki sapne kayi
baar haqeeqat
bhi ban jate hai
bas unke
dekhne ke
khwab ko hame
kabhi nahi
chodna
chahiye………..

Monday, 5 December 2011

बारह राजकुमारियाँ

बहुत समय पहले
की बात है।
किसी राज्य में एक
राजा शासन
करता था।
उसकी बारह
बेटियाँ थीं।
सभी बेहद सुंदर थीं।
मगर राजा के लिये
एक
बड़ी समस्या थी।
बारहों राजकुमारियों को रोज़
नयी जूतियाँ चाहिये
होती थीं क्योंकि रोज़
ही उनकी जूतियाँ पूरी तरह
से फटी होती थीं,
कुछ इस तरह से
कि लगता था कि कोई
सारे दिन या रात
भर जूतियाँ पहन कर
नाचा हो। राजा के
लाख पूछने पर
भी राजकुमारियाँ इस
का कारण
नहीं बताती थीं कि उन्हें
रोज़ जूते बदलने
की क्या आवश्यकता होती है
और
उनकी जूतियाँ रोज़
फट कैसे जाती हैं।
एक दिन राजा ने तंग
आ कर सारे देश में
ऐलान कर
दिया कि जो कोई
भी इस राज़ से
पर्दा उठा सकेगा,
उस
व्यक्ति को पुरस्कार
स्वरूप न सिर्फ़ उसके
पसंदीदा राजकुमारी से
शादी करने
का मौक़ा दिया जायेगा बल्कि उस
देश
का उत्तराधिकारी भी बना दिया जायेगा।
इस काम के लिये उस
व्यक्ति विशेष
को तीन दिन
का समय
दिया जायेगा और
अगर वो इस राज़ से
पर्दा उठाने में
असमर्थ
रहा तो उसका सर
धड़ से अलग कर
दिया जायेगा।
कई अन्य राज्यों से
अनेक राजकुमार
अपना अपना भाग्य
आज़माने आये। मगर
तीन दिन तक उन
राजकुमारियों के
साथ साथ रहने पर
भी वो इस बात
का पता नहीं कर सके
कि उन
राजकुमारियों को अपनी जूतियाँ बदलने
की ज़रूरत
क्यों होती है। इस
तरह अनेक
राज्कुमारों और
अनेक लोगों ने
अपनी जान गँवाई,
मगर
राजकुमारियों उस
राज़ पर
पर्दा पड़ा रहा।
उसी समय की बात है
जब एक अधेड़ उम्र
का सैनिक,
जो कि किसी जंग में
काफ़ी ज़ख़्मी हो चुका था,
उसी राज्य से गुज़र
रहा था। उसे जब
राजा के इस
अजीबोग़रीब
घोषणा और
पुरस्कार
का पता चला तो वो भी अपना भाग्य
आज़माने को मचल
पड़ा। उसी राज्य में
उसकी मुलाक़ात एक
बुढ़िया से हुई
जिसकी उसने मदद
की। बुढिया ने उससे
ख़ुश हो कर
कहा कि अगर तुम
सचमुच उन
राज्कुमारियों के
राज़ का पर्दाफ़ाश
करना चाहते
हो तो दो बातों का ध्यान
रखना। पहला ये
कि कभी भी उन
राजकुमारियों द्वारा दिया हुआ
कोई भी पेयपदार्थ
मत पीना और ये कोट
रख लो। इस कोट
को तुम जब
भी पहनोगे तो तुम
ग़ायब हो जाओगे।
तुम्हें तो कोई देख
नहीं पायेगा मगर
तुम सभी को देख
सकोगे।
तब वह सैनिक उस
बुढ़िया को धन्यवाद
कह और वह कोट ले
कर राजा के महल में
अपना भाग्य
आज़माने पहुँच गया।उस सैनिक
को राजा ने कई बार
चेतावनी दी और
अपने कार्य में सफ़ल न
होने पर अंजाम से
अवगत कराया मगर
सैनिक अपने निश्चय
पर दृढ़ रहा। तब
राजा ने उसे
राजकुमारियों के
कमरे से लगे एक कमरे
में तीन दिन बिताने
की व्यवस्था कर
दी। इस कमरे
का दरवाज़ा राजकुमारियों के
कमरे के साथ खुला हुआ
था।
शाम को खाना खाने
के बाद,
राजकुमारियों ने
उस सैनिक को अंगूर से
बनी शराब पीने के
लिये दी। सैनिक ने
वो शराब ले
तो ली मगर
बुढि़या की बात
याद करके उसे आँख
बचा कर फेंक दिया।
थोड़ी देर बाद
सैनिक अपने कमरे में
जा कर सोने
का नाटक करने
लगा और ज़ोर ज़ोर से
खर्राटे भरने लगा।
उसे सोता देख
सभी राजकुमारियाँ खुश
हो गईं। वो धीरे से
उठीं और उन्होंने
अपनी पोषाक बदल
कर सुंदर पोषाक
पहनी। फिर उन्होंने
जूतियाँ पहनी और
सभी राजकुमारियाँ फ़र्श
के एक गुप्त दरवाज़े से
निकल कर जाने
लगीं।
सैनिक ये सब एक आँख
भींचे देख रहा था।
जैसे
ही राजकुमारियाँ जाने
लगीं,
वो भी उठा और उसने
बुढ़िया की दी हुई
कोट पहन ली और
राजकुमारियों के
पीछे चल पड़ा। सबसे
छोटी राजकुमारी सबसे
पीछे चल रही थी।
गुप्त दरवाज़े से सुरंग
की ओर बढ़ते हुए,
सीढियों पर, सैनिक
का पैर
छोटी राजकुमारी की लंबी पोषाक
पर पड़ गया।
छोटी राजकुमारी घबरा गई
और कह
उठी कि उसकी पोषाक
को किसी ने पीछे से
खींचा है।
सभी राजकुमारियों ने
उसे
तसल्ली दी कि वह
कुछ और
नहीं बल्कि उसका वहम
है।
सुरंग में और नीचे
जाते-जाते,
सभी राजकुमारियाँ एक
चाँदी के बगीचे में
पहुँचीं। वहाँ फूल,
पत्ते, पेड़
आदि सभी चाँदी के
बने हुए थे। ये देख कर
सैनिक हैरान रह
गया।
बारहों राजकुमारियाँ वहाँ मिल
कर खूब नाचीं।
सैनिक ने
राजा को सबूत देने के
लिये उस बगीचे से एक
चाँदी की डाल
तोड़ी और अपने जेब में
रख ली। डाल के टूटने
से एक ज़ोर की आवाज़
आई जिसे सुन कर
छोटी राजकुमारी घबरा गई।
मगर फिर सभी ने
मिल कर उसे
समझाया कि वो उसका वहम
मात्र है।
सुरंग में और नीचे जाने
पर अब एक सोने
का बगीचा आया और
वहाँ भी राजकुमारियाँ मिल
कर खूब नाचीं। उस
सैनिक ने वहाँ के सबूत
के तौर पर एक सोने
की डाल तोड़ ली और
अपने जेब में रख ली।
आगे और जाने पर
इसी तरह एक हीरे
का बगीचा आया जहाँ फिर
से
राजकुमारियाँ मिल
कर नाचीं और सैनिक
ने वहाँ से भी एक
डाल तोड़ कर रख
ली। हर बार
डालों के टूटने
की आवाज़ से
छोटी राजकुमारी के
डर जाने पर उसे अन्य
राजकुमारियों ने
वहम का पाठ
पढ़ा दिया।
आगे जाने पर आख़िर में
एक बड़ी सी झील आई
जहाँ बारह सुंदर
नौकायें
प्रतीक्षा कर
रही थीं। हर
नौका में एक
राजकुमार था और
राजकुमारियाँ एक-
एक नौका में
चली गईं। सैनिक
भी छोटी राजकुमारी के
नौके में चढ़ गया।
नौके को खे रहे
राजकुमार ने संदेह
प्रकट किया कि आज
उसे नौका सामान्य
दिनों की अपेक्षा भारी लग
रही है, मगर आसपास
तो कोई
भी नहीं था। तब
राजकुमारी ने
कहा कि ये सिर्फ़
मौसम
की गर्मी का असर है
जो हवा की गर्मी और
उमस से
नौका भी भारी हो गई
है।
थोड़ी देर बाद
नौकायें एक किनारे
पर पहुँचीं। किनारे
पर एक सुंदर महल
था। महल के अंदर से
बाजों की आवाज़ आ
रही थी।
सभी राजकुमारियाँ नौकाओं
से उतर कर महल के
अंदर पहुँचीं और
वहाँ पहुँच कर वे
राजकुमारों के साथ
खूब नाचीं।
सारी रात इस तरह
नाचने से
उनकी जूतियाँ तार-
तार हो गईं। अंगूर
की शराब पीने और
लाजवाब
खाना खाने के बाद
राजकुमारियाँ नौकाओं
में बैठ कर अपने घर
लौटने लगीं। सैनिक
ने सबूत के रूप में
वहाँ से एक शराब
का गिलास
उठा लिया और
अपनी जेब में रख
लिया।
इस बार सैनिक
बड़ी राजकुमारी की नौका में
बैठा और सबसे पहले
दौड़ कर अपने कमरे में
पहुँच कर सोने
का फिर से नाटक
करने लगा।
राजकुमारियों ने
जब उसे अपने कमरे में
सोता पाया तो खूब
हँसीं और निश्चिंत
हो कर सोने
चली गईं।
इसी तरह सैनिक ने
तीनों रातों को राजकुमारियों का पीछा किया और
सबूत जमा किये।
चौथे दिन, सैनिक ने
राजा को पूरी कहानी सुनाई
और सबूत पेश किये।
अब
राजकुमारियाँ कोई
बहाना नहीं बना पाईं
और तब सैनिक ने
पुरस्कार स्वरूप
बड़ी राजकुमारी से
शादी कर ली और
बाद में एक
अच्छा राजा बन कर
बहुत दिनों तक राज
किया।

एक राजा और उसकी दो रानियाँ

दूर किसी देश में एक
राज्य था,
कमलापुरी।
कमलापुरी के
राजा की दो रानियाँ थीं।
दोनों ही बड़ी सुंदर
थीं। मगर
दुर्भाग्यवश
बड़ी रानी के बस एक
ही बाल थे और
छोटी रानी के दो।
बड़ी रानी बहुत
भोली थी और
छोटी रानी को फूटी आँख
न सुहाती थी। एक
दिन छोटी रानी ने
बड़ी रानी से कहा,"
बड़ी दीदी, आपके सर
पर मुझे एक सफ़ेद बाल
दिखाई दे रहा है,
आइये उसे निकाल दूँ।"
बड़ी रानी ने कहा,
मगर मेरे तो सिर्फ़
एक ही बाल हैं,
क्या वो भी सफ़ेद
हो गया?"
छोटी रानी ने झूठ
मूठ
का गुस्सा दिखाया और
बोली," ठीक है अगर
मुझ पर विश्वास
नहीं तो मुझसे बात
करने की भी ज़रूरत
नहीं। मैं तो आपके भले
के लिये ही कह
रही थी।"
भोली भाली बड़ी रानी छोटी रानी की बातों में
आ गई, और
छोटी रानी ने
उसका वो एक बाल
चिमटी से खींच कर
निकाल दिया।
बड़ी रानी के अब
कोई बाल
बाकी नहीं रहे।
राजा ने जब ये
देखा तो बहुत
नाराज़ हुये और
बिना कुछ कहे सुने
बड़ी रानी को घर से
निकाल दिया।
बड़ी रानी रोते
रोते राज्य से बाहर
चली गई। एक नदी के
किनारे, अनार के पेड़
के नीचे बैठ कर
वो ज़ोर ज़ोर से
रो रही थी कि तभी एक
बित्ते भर की बहुत
सुंदर परी प्रकट
हुई। उस परी ने
रानी से उसके रोने
का कारण पूछा।
बड़ी रानी ने सब कुछ
सच सच बता दिया।
तब परी बोली, "
ठीक है, मैं
जैसा कहती हूँ,
वैसा ही करो, न
ज़्यादा न कम। पहले
इस नदी में तीन
डुबकी लगाओ और
फिर इस अनार के पेड़
से एक अनार तोड़ो।"
और ऐसा कह कर
परी गायब
हो गयी।
बड़ी रानी ने
वैसा ही किया जैसा कि परी ने
कहा था। जब
रानी ने
पहली डुबकी लगाई
तो उसके शरीर
का रंग और साफ़
हो गया, सौंदर्य और
निखर गया।
दूसरी डुबकी लगाने
पर उसके शरीर में
सुंदर कपड़े और ज़ेवर आ
गये।
तीसरी डुबकी लगाने
पर रानी के सुंदर लंबे
काले घने बाल आ गये।
इस तरह रानी बहुत
सुंदर लगने लगी।
नदी से बाहर निकल
कर रानी ने परी के
कहे अनुसार अनार के
पेड़ से एक अनार
तोड़ा। उस अनार के
सारे बीज सैनिक बन
कर फूट आये और
रानी के लिये एक
तैयार पालकी में उसे
बिठा कर राज्य में
वापस ले गये।
राजमहल के बाहर
शोर सुन कर राजा ने
अपने मंत्री से
पता करने
कहा कि क्या बात
है। मंत्री ने आकर
ख़बर
दी कि बड़ी रानी का जुलूस
निकला है। राजा ने
तब
बड़ी रानी को महल
में बुला कर
सारी कहानी सुनी और
पछताते हुये इस बार
छोटी रानी को राज्य
से बाहर निकल जाने
का आदेश दिया।
छोटी रानी ने पहले
ही परी की सारी कहानी सुन
ली थी।
वो भी राज्य से
बाहर जा कर अनार
के पेड़ के नीचे,
नदी किनारे जा कर
रोने लगी।
पिछली बार जैसे
ही इस बार
भी परी प्रकट हुई।
परी ने
छोटी रानी से
भी उसके रोने
का कारण पूछा।
छोटी रानी ने झूठ
मूठ बड़ी रानी के
ऊपर दोष
लगाया और
कहा कि उसे
बड़ी रानी महल से
बाहर निकाल
दिया है। तब
परी बोली, " ठीक
है, मैं जैसा कहती हूँ,
वैसा ही करो, न
ज़्यादा न कम। पहले
इस नदी में तीन
डुबकी लगाओ और
फिर इस अनार के पेड़
से एक अनार तोड़ो।"
और ऐसा कह कर
परी गायब
हो गयी।
छोटी रानी ने ख़ुश
हो कर नदी में
डुबकी लगाई। जब
रानी ने
पहली डुबकी लगाई
तो उसके शरीर
का रंग और साफ़
हो गया, सौंदर्य और
निखर आया।
दूसरी डुबकी लगाने
पर उसके शरीर पर
सुंदर कपड़े और ज़ेवर आ
गये।
तीसरी डुबकी लगाने
पर रानी के सुंदर लंबे
काले घने बाल आ गये।
इस तरह रानी बहुत
सुंदर लगने लगी। जब
छोटी रानी ने ये
देखा तो उसे
लगा कि अगर
वो तीन
डुबकी लगाने पर
इतनी सुंदर बन
सकती है, तो और
डुबकिय़ाँ लगाने पर
जाने कितनी सुंदर
लगेगी। इसलिये,
उसने एक के बाद एक
कई
डुबकियाँ लगा लीं।
मगर
उसका ऐसा करना था कि रानी के
शरीर के सारे कपड़े
फटे पुराने हो गये,
ज़ेवर गायब हो गये,
सर से बाल चले गये
और सारे शरीर पर
दाग़ और मस्से दिखने
लगी।
छोटी रानी ऐसा देख
कर दहाड़े मार मार
कर रोने लगी। फिर
वो नदी से बाहर आई
और अनार के पेड़ से
एक अनार तोड़ा।
उस अनार में से एक
बड़ा सा साँप
निकला और
रानी को खा गया।
इस कहानी से हमें
सीख मिलती है
कि दूसरों का कभी बुरा नहीं चाहना चाहिये,
और लोभ
नहीं करना चाहिये।

प्रिँछी एक परी की कहानी

परियों की थी एक
शहज़ादी ,
नाम था उसका ‘
प्रिंछी ‘ !
खुशियों का था
आशियाना उसका ,
ग़मों से
थी वो अनजानी !
खिलते फूलों-
सी मुस्कान
थी उसकी ,
महकती थी जिससे
बगिया सुहानी !
हँसते-खेलते बीत
रही थी उसकी ,
खुशियों से
भरी ज़िंदगानी !
एक दिन अनजाने में
’ प्रिंछी ‘ ,
आसमां से इस
धरती पर आई !
देख इस दुनिया की
खुबसूरती ,
पहले तो वो अति
हर्षाई ,
पर देख इंसान
की दशा ,
उस परी की आँख
भर आई !
भूखे-बेबस
लोगों की
तृष्णा उसे रास
ना आई !
दुःख से अनजान उस
परी के मन में ,
एकदम
मायूसी छाई !
उसने सोचा -
ये कैसी है दुनिया ,
जहाँ ऊंच-नीच
की है खाई !
रिश्तों की
उधेड़बुन में ,
यहाँ लड़ते है भाई-
भाई !
ईर्ष्या-द्वेष
की भावना यहाँ ,
इंसान के मन में है
समाई !
धर्मं और मज़हब के
नाम पर ,
यहाँ होती है बस
लडाई !
मासूम गरीब
बच्चों ने यहाँ ,
उतरन में हर
खुशी है पाई !
ज़िन्दगी की हर
खुशी पर इनकी ,
ग़मों की परछाई है
छाई !
ये कैसी है दुनिया ,
ये कैसे है लोग ,
कैसी है ये पीर
पराई ,
देख इस
दुनिया की हालत ,
‘ प्रिंछी ‘ कुछ समझ
ना पाई !
जब इंसानों की इस
दुनिया से ,
परियों के देश
वो लौट आई !
तब केवल एक
ही बात ,
उसके मन में है आई !
काश, इंसानों की
दुनिया भी ,
हम परियों-
सी होती !
न होता ऊंच-नीच
का भेद ,
न होता कोई
जातिवाद ,
न होती भूख और
बेबसी ,
न होता कोई
विकार !
मर्म देख इस
दुनिया का ,
उस
नन्ही परी की आँख
भर आई !
जो अब तक
थी ग़मों से
अनजानी ,
वो आज
उसकी परिभाषा
है जान पाई !

त्याग और दयालुता का फल

एक समय की बात है कि एक
गांव में एक बहुत उदार
तथा दयालु
नन्हीं लड़की रहती थी। वह
थी तो अनाथ, पर
ऐसा लगता था जैसे
सारा संसार उसी का है। वह
सभी से प्रेम करती थी और
दूसरे सब भी उसे बहुत चाहते
थे।
पर दुख की बात यह
थी कि उसके पास रहने के लिए
कोई घर नहीं था। एक दिन
इस बात से वह इतनी दुखी हुई
कि उसने किसी को कुछ बताए
बिना ही अपना गांव छोड़
दिया। वह जंगल की ओर चल
दी। उसके हाथ में बस एक
रोटी का टुकड़ा था।
वह कुछ ही दूर गई
थी कि उसने एक बूढ़े
आदमी को सड़क के किनारे बैठे
देखा। वह बूढ़ा-बीमार-
सा लगता था। उसका शरीर
हड्डियों का ढांचा मात्र
था। अपने लिए स्वयं
रोटी कमाना उसके बस
का काम नहीं था। इसलिए
वह भीख मांग रहा था।
उसने आशा से लड़की की ओर
देखा।
‘‘ओ प्यारी नन्हीं बिटिया !
मैं एक बूढ़ा आदमी हूं।
मेरी देखभाल करने वाला कोई
नहीं है। मेहनत-मजदूरी करने
की मेरे शरीर में शक्ति नहीं,
तीन दिन से मैंने कुछ
नहीं खाया है। मुझ पर
दया करो और मुझे कुछ खाने
को दो।’’ वह
बूढ़ा व्यक्ति गिड़गिड़ाया।
नन्हीं लड़की स्वयं
भी भूखी थी। उसने
रोटी की टुकड़ा इसलिए
बचा रखा था ताकि खूब भूख
लगने पर खाए। फिर भी उसे
बूढ़े व्यक्ति पर दया आ गई।
उसने
अपना रोटी का टुकड़ा बूढ़े
को खाने के लिए दे दिया।
वह बोली-‘‘बाबा, मेरे पास
बस यह रोटी का टुकड़ा है।
इसे ले लो, काश ! मेरे पास और
कुछ होता।’’
इतना कहकर और
रोटी का टुकड़ा देकर व आगे
चल पड़ी। उसने मुड़कर
भी नहीं देखा।
वह कुछ ही दूर और आगे गई
थी कि उसे एक बालक नजर
आया, जो ठंड के मारे कांप
रहा था। उदार और दयालु
तो वह थी ही, उस ठिठुरते
बालक के पास जाकर
बोली-‘‘भैया, तुम तो ठंड से
मर जाओगे। मैं तुम्हारी कुछ
सहायता कर सकती हूँ ?’’
बालक ने दयनीय नजरों से
नन्हीं लड़की की ओर देखा-
‘‘हां दीदी ! यहां ठंड बहुत है।
सिर छुपाने के लिए घर
भी नहीं है मेरे पास।
क्या करूं ? तुम्हारी बहुत
कृपा होगी यदि तुम मुझे कुछ
सिर ढंकने के लिए दे दो।’’
छोटा बालक कांपता हुआ
बोला।
नन्हीं लड़की मुस्कुराई और
उसने अपने टोपी (हैट)
उतारकर बालक के सिर पर
पहना दी। बालक
को काफी राहत मिली।
‘‘भगवान करे, सबको तुम्हारे
जैसी दीदी मिले। तुम बहुत
उदार व कृपालु हो।’’ बालक ने
आभार प्रकट करते हुए कहा,
‘‘ईश्वर तुम्हारा भला करे।’’
लड़की मुंह से कुछ बोली नहीं।
केवल बालक की ओर प्यार से
मीठी-सी मुस्कराहट के साथ
देखकर आगे बढ़ गई।
वह सिर झुकाकर कुछ
सोचती चलती रही।
आगे जंगल में
नन्हीं लड़की को एक
बालिका ठंड से कंपकंपाती हुई
मिली, जैसे भाग्य
उसकी परीक्षा लेने पर
तुला था। उस छोटी-
सी बालिका के शरीर पर
केवल एक पतली-सी बनियान
थी। बालिका की दयनीय
दशा देखकर नन्हीं लड़की ने
अपना स्कर्ट उतार कर उसे
पहना दिया और ढांढस
बंधाया-‘‘बहना, हिम्मत मत
हारो। भगवान
तुम्हारी रक्षा करेगा।’’
अब नन्हीं लड़की ने तन पर
केवल स्वेटर रह गया था। वह
स्वयं ठंड के मारे कांपने लगी।
परंतु उसके मन में संतोष
था कि उसने एक ही दिन में
इतने सारे
दुखियों की सहायता की थी।
वह आगे चलती गई। उसके मन में
कोई स्पष्ट लक्ष्य
नहीं था कि उसे
कहां जाना है।
अंधेरा घिरने लगा था। चांद
बादलों के पीछे से लुका-
छिपी का खेल खेल रहा था।
साफ-साफ दिखाई
देना भी अब बंद हो रहा था।
परंतु नन्हीं लड़की ने अंधेरे
की परवाह किए
बिना ही अनजानी मंजिल
की ओर चलना जारी रखा।
एकाएक सिसकियों की आवाज
उसके कानों में पड़ी। ‘यह कौन
हो सकता है ?’ वह स्वयं से
बड़बड़ाई। उसने रुककर
चारों ओर आंखें फाड़कर देखा।
‘‘ओह ! एक नन्हा बच्चा !’’
नन्हीं लड़की को एक बड़े पेड़ के
पास एक छोटे से नंगे बच्चे
की आकृति नजर आ गई थी। वह
उस आकृति के निकट पहुंची और
पूछा-‘‘नन्हें भैया, तुम
क्यों रोते हो ? ओह हां,
तुम्हारे तन पर तो कोई
कपड़ा ही नहीं है। हे भगवान,
इस बच्चे पर दया करो। यह
कैसा अन्याय है कि एक
इतना छोटा बच्चा इस
सर्दी में नंगा ठंड से जम
रहा है !’’ उसका गला रुंध
गया था।
नन्हें बच्चे ने कांपते और
सिसकते हुए कहा-‘‘द-दीदी,
ब...बहुत कड़ाके की सर्दी है।
मुझ पर दया करो। कुछ मदद
करो।’’’‘‘हां-हां, नन्हे भैया।
मैं अपना स्वेटर उतारकर तुम्हें
दे रही हूं। बस यही कपड़ा है
मेरे पास। लेकिन तुम्हें
इसकी मुझसे अधिक जरूरत है।’’
ऐसा कहते हुए नन्हीं लड़की ने
स्वेटर छोटे बच्चे
को पहना दिया।
अब उसके पास तन पर कपड़े के
नाम पर एक
धागा भी नहीं रह गया था।
वह रुकी नहीं। चलती रही।
इसी प्रकार चलते-चलते वह
जंगल में एक खुली जगह
जा पहुंची। वहां से आकाश
दीख रहा था और दीख रहे थे
बादलों से लुका-
छिपी खेलता चांद तथा टिम-
टिम करते तारे।
अब सर्दी बढ़ गई थी और ठंड
असहनीय हो गई थी।
नन्हीं लड़की का शरीर
बुरी तरह कांपने लगा था और
दांत किटकिटा रहे थे।
उसने सिर उठाकर आकाश
की ओर देखा और एक आह भरी।
फिर आंखों में छलकते आंसुओं के
साथ वह
नन्हीं लड़की बोली-‘‘हे प्रभु,
मैं नहीं जानती कि कौन-
सी शक्ति मुझे यहां खींच लाई
है ! मैं यहाँ क्यों आई ! पर मुझे
विश्वास हो रहा है
कि यदि यहां से मैं तुमसे
विनती करूं तो तुम अवश्य
मेरी आवाज सुनोगे। मेरे सामने
फैली झील, आकाश की ओर उठते
ये सुन्दर-सुंदर पेड़ दूर नजर
आती बर्फ से
ढकी पर्वतों की चोटियां,
आकाश का चांद
तथा झिलमिलाते सितारे
तुम्हें अर्पित
मेरी प्रार्थना के
साक्षी है।’’ ऐसा कहते हुए वह
फफक कर रो पड़ी।
काफी समय बाद वह संयत
हुई। उसने फिर
प्रार्थना की-‘ईश्वर, क्या मैं
जान सकती हूं कि तुमने मेरे
माता-पिता क्यों छीन लिए
जबकि मुझे उनकी छत्र-
छाया की बहुत
आवश्यकता थी ? मुझे अनाथ
बनाकर तुम्हें क्या मिला ? इस
सारे ब्रह्मांड के तुम
स्वामी हो, पर मुझे रहने के
लिए एक छोटा-सा घर
भी नहीं मिला ?
क्या यही तुम्हारा न्याय है ?
यही नहीं तुमने मेरे हाथ
का वह रोटी का छोटा-
सा टुकड़ा भी ले लिया। इस
शीत भरी रात में तुम्हारे
संसार में इतने सारे छोटे-छोटे
बच्चे बेसहारा और बेघर बाहर
जंगल में पड़े भूखे नंगे ठिठुर रहे
हैं कि मुझे अपने भी एक-एक
करके उतारकर उन्हें देने पड़े।
परिणामस्वरूप मैं तुम्हारे
सामने वस्त्रहीन खड़ी हूं।’
नन्हीं लड़की सांस लेने के लिए
रुकी।
कुछ देर पश्चात उसने भर्राए
गले से उलाहना दी-‘मैंने
कभी तुमसे शिकायत नहीं की।
न ही तुम्हें कोसा परंतु
इसका अर्थ यह नहीं है
कि मेरी कोई भावनाएं
ही नहीं है या मेरा हृदय
पत्थर है। खैर, मेरे माता-
पिता की छोड़ो लेकिन...।’
नन्हीं लड़की न जाने कब तक
क्या-क्या शिकायत
करती रहती यदि ऊपर से एक
आवाज ने उसे टोका न होता।
ऊपर से आकाशवाणी हुई-‘‘ओ
प्यारी नन्हीं लड़की, मैं
तुम्हारा दुख समझता हूं।’’
लड़की ने चौंककर आकाश
की ओर निहारा।
आकाशवाणी जारी रही-‘‘...पर
क्योंकि तुम मेरी विशेष संतान
हो इसलिए मैंने तुम्हें
धरती पर विशेष प्रयोजन से
भेजा है। ऐसी संतान को कष्ट
सहने पड़ते हैं और घोर
परीक्षाओं से
गुजरना पड़ता है। मुझे तुम पर
गर्व है। तुमने
सारी परीक्षाएं
सफलतापूर्वक पार की हैं। अब
तुम सुंदर वस्त्रों से सजी हो,
जरा अपने बदन की ओर देखो।’’
नन्हीं लड़की ने अपने बदन
को निहारा तो दंग रह गई।
सचमुच वह अलौकिक रूप से
मनमोहक वस्त्रों से ढकी थी।
अब चौंकाने की बारी भगवान
की थी।
चमत्कार पर चमत्कार होने
लगे। नन्हीं लड़की के सामने
स्वादिष्ट व्यंजनों से सजे थाल
प्रकट हुए। आकाश से
घोषणा हुई-‘‘मेरी प्यारी बच्ची,
मैं तुम्हारे माता-
पिता को रात के भोजन पर
तुम्हारे पास भेजूंगा। वे एक
पूरी रात तुम्हारे साथ रहेंगे।
और हां, मैं वचन देता हूं
कि महीने में एक बार जब तुम
इस स्थान पर आओगी, तो वे
तुम्हारे साथ एक पूरी रात
रहेंगे।’’
नन्हीं लड़की की प्रसन्नता का पारावार
न रहा। जब उसने अगले
ही क्षण अपने माता-
पिता को अपने सामने खड़े
पाया। उन्होंने
अपनी बेटी को उठाकर
बारी-बारी से छाती से
लगा लिया और खूब
चूमा तथा रोए। खुशी के आंसू
तीनों की आंखों में झर रहे थे।
मां ने अपने हाथों से
नन्हीं लड़की को खाना खिलाना आरंभ
किया। तीनों ने साथ-साथ
भोजन किया। उस रात
नन्हीं लड़की सोई नहीं।
माता-पिता भी नहीं सोए।
उन्हें
भी अपनी बिटिया को बहुत
कुछ बताना था।
बातों ही बातों में रात
कटती रही।
पौ फटने से पहले एक और
चमत्कार हुआ।
वे तीनों आकाश और चांद-
सितारों को लेटे-लेटे निहारते
हुए बातें कर रहे थे। अकस्मात्
झिलमिलाते तारे टूट-टूट कर
आकाश से नीचे गिरने लगे। हर
तारा जो धरती पर आ
गिरा एक सोने के टुकड़े में बदल
गया।
मां ने मुस्कराकर बेटी की ओर
देखा-
‘‘प्यारी-प्यारी बिटिया।
पौ फटते ही हमें यहां से
जाना होगा। जितने सोने के
टुकड़े तुम बटोर सकती हो,
बटोर लो। अपने गांव लौटकर
अपने लिए एक प्यारा-सा घर
बनाना और सुख से रहना। हां,
एक बात और..।’’ उसने प्यार से
अपनी बेटी को सहलाते हुए
कहा-‘‘तुम्हारे नामकरण से
पहले ही हमारी मृत्यु हो गई
थी। प्रभु की कृपा से अब वह
काम हम कर सकते हैं। अब से
तुम्हारा नाम ‘मालती’
होगा।
अलविदा प्यारी बिटिया।
मालती अलविदा।’’ ऐसा कहते
हुए नन्हीं लड़की के माता-
पिता लुप्त होने लगे।
मालती ने जब तक उत्तर में
अलविदा करने के लिए हाथ
उठाया, तब तक वे दोनों लुप्त
हो चुके थे। फिर
भी नन्हीं मालती को यह
आसरा तो था ही कि वह कम
से कम महीने में एक बार
तो अपने माता-पिता से मिल
ही सकेगी। वह पूरी रात
उनके साथ बिता सकेगी।
वह काफी देर आकाश की ओर
ताकती रही।
फिर मालती अपने गांव लौट
आई और एक छोटा सुंदर-सा घर
बनवाकर उसमें सुख-चैन से रहने
लगी।
अब वह दुनिया की और कुछ
भी बात भूल जाए परंतु महीने
में एक बार जंगल की खुली जगह
पर जाकर अपने माता-
पिता के साथ नियत समय पर
रात बिताना नहीं भूलती।

जादू की छड़ी

एक
रात
की बात
है शालू अपने बिस्तर
पर लेटी थी।
अचानक उसके कमरे
की खिडकी पर
बिजली चमकी। शालू
घबराकर उठ गई।
उसने
देखा कि खिडकी के
पास एक
बुढिया हवा मे उड़
रही थी।
बुढ़िया खिडकी के
पास आइ और
बोली ``शालू तुम मुझे
अच्छी लड़की हो।
इसलिए मैं तुम्हे कुछ
देना चाहती हूँ।''
शालू यह सुनकर बहुत
खुश हुई।
बुढिया ने शालू
को एक छड़ी देते हुए
कहा ``शालू ये जादू
की छड़ी है। तुम इसे
जिस भी चीज
की तरफ मोड़ कर
दो बार
घुमाओगी वह चीज
गायब हो जाएगी।''
अगले दिन सुबह शालू
वह छड़ी अपने स्कूल ले
गई। वहा उसने
शैतानी करना शुरू
किया। उसने पहले
अपने समने
बैठी लड़की की किताब
गायब कर दी फिर
कइ बच्चों की रबर
और पेंसिलें भी गायब
कर दीं।
किसी को भी पता न
चला कि यह शालू
की छड़ी की करामात
है।
जब वह घर पहुँची तब
भी उसकी शरारतें
बंद नही हुई। शालू
को इस खेल में
बडा मजा आ
रहा था। रसोई के
दरवाजे के सामने एक
कुरसी रखी ती।
उसने सोचा, ``क्यों न
मै इस
कुरसी को गायब कर
दूँ। जैसे ही उसने
छडी घुमाई वैसे
ही शालू
की माँ रसोइ से
बाहर निकल कर
कुरसी के सामने से
गुजरीं और
कुरसी की जगह शालू
की माँ गायब
हो गईं।
शालू बहुत घबरा गई
और रोने लगी। इतने
ही में उसके सामने वह
बुढिया पकट हुई।
शालू ने
बुढिया को सारी बात
बताई। बुढिया ने
शालू से कहा `` मै
तुम्हारी माँ को वापस
ला सकती हू लेकिन
उसके बाद मै तुमसे ये
जादू की छडी वापस
ले लूगी।''
शालू बोली ``तुम्हे
जो भी चाहिए ले
लो लेकिन मुझे
मेरी माँ वापस
ला दो।'' तब
बुढिया ने एक जादुई
मंत्र पढ़ा और देखते
ही देखते शालू
की माँ वापस आ गई।
शालू ने मुड़ कर
बुढ़िया का शुक्रिया अदा करना चाहा लेकिन
तब तक बुढ़िया बहुत
दूर बादलों में
जा चुकी थी। शालू
अपनी माँ को वापस
पाकर बहुत खुश हुई
और दौडकर गले से लग
गई।शिक्षा:-हमेँ अपनी शक्तियोँ का गलत इस्तेमाल नहीँ करना चाहिए।

Sunday, 4 December 2011

मुर्गे की सीख

एक बड़ा, व्यापारी था, गांव
में जिसके पास बहुत से मकान,
पालतू पशु और कारखाने थे।
एक दिन वह अपने परिवार
सहित कारखानों, मकानों और
पशुशालाओं
आदि का मुआयना करने के लिए
गांव में गया।
उसने अपनी एक
पशुशाला भी देखी जहां एक
गधा और एक बैल बंधे हुए थे।
उसने देखा कि व्यापारी पशु-
पक्षियों की बोली समझता था,
इसलिए वह चुपचाप
खड़ा होकर दोनों की बातें
सुनने लगा।
बैल गधे से कह रहा था-‘‘तू
बड़ा ही भाग्यशाली है
जो मालिक तेरा इतना ख्याल
रखता है खाने को दोनों समय
जौ और पीने के लिए साफ
पानी मिलता है। इतने आदर-
सत्कार के बदले तुझसे केवल यह
काम लिया जाता है
कि कभी मालिक तेरी पीठ
पर बैठकर कुछ दूर सफर कर
लेता है। और तू
जितना भाग्यवान है, मैं
उतना ही अभागा हूं। मैं
सवेरा होते ही पीठ पर हल
लादकर जाता हूं। वहां दिन
भर हलवाहे मुझे हल में जोतकर
चलाते हैं।’’
गधे ने यह सुनकर कहा-‘‘ऐ
भाई ! तेरी बातों से लगता है
कि सचमुच तुझे बड़ा कष्ट है।
किन्तु सच तो यह है कि तू
यदि मेहनत करते-करते मर
भी जाए, तो भी ये लोग
तेरी दशा पर तरस
नहीं खाएंगे। अतः तू एक काम
कर फिर तुझसे इतना काम
नहीं लिया जाएगा और सुख से
रहेगा।’’
‘‘ऐसा क्या करूं मित्र ?’’
उत्सुकता से बैल ने पूछा।
बैल के पूछने पर गधे ने कहा-‘‘तू
झूठ-मूठ का बीमार पड़ जा।
एक शाम को दाना-भूसा मत
खा और अपने स्थान पर इस
प्रकार लेट जा कि अब
मरा कि तब मरा।’’
दूसरे दिन सुबह जब
हलवाहा बैल को लेने के लिए
पशुशाला में पहुंचा तो उसने
देखा कि रात की लगाई
सानी ज्यों-की-त्यों रखी है
और बैल धरती पर पड़ा हांफ
रहा है। उसकी आंखें बंद है और
उसका पेट फूला हुआ है।
हलवाहे ने समझा कि बैल
बीमार हो गया है।
यही सोचकर उसने उसे हल में न
जोता। उसने
व्यापारी को बैल
की बीमारी की सूचना दी।
व्यापारी यह सुकर जान
गया कि बैल ने गधे
की शिक्षा पर अमल करके
स्वयं को रोगी दिखाया है।
उसने हलवाहे से कहा, ‘‘आज गधे
को हल में जोत लो।’’
तब हलवाहे ने गधे को हल में
जोतकर उससे सारा दिन काम
लिया।
इधर, बैल दिन, भर बड़े आराम
से रहा। वह नांद
की सारी सानी खा गया और
गधे को दुआएं देता रहा। जब
गधा गिरता-पड़ता खेत से
आया तो बैल ने कहा, ‘‘भाई
तुम्हारे उपदेश के कारण मुझे
बड़ा सुख मिला।’’
गधा थकान के कारण उत्तर न
दे सका और आकर अपने स्थान
पर गिर पड़ा। वह मन-ही-
मन अपने को धिक्कारने लगा,
‘अभागे, तूने बैल को आराम
पहुंचाने के लिए अपनी सुख-
सुविधा में व्यधान डाल
दिया।’
दूसरे दिन
व्यापारी रात्रि भोजन के
पश्चात अपनी पत्नी के साथ
गधे की प्रतिक्रिया जानने के
लिए पशुशाला में जा बैठा और
पशुओं की बातें सुनने लगा। गधे
ने बैल से पूछा-‘‘सुबह जब
हलवाहा तुम्हारे लिए दाना-
घास लाएगा, तो तुम
क्या करोगे ?’’
‘‘जैसा तुमने
कहा वैसा ही करूंगा।’’ बैल ने
उत्तर दिया।
इस पर गधे ने कहा-‘‘नहीं,
ऐसा मत करना, वरना जान से
जाओगे। शाम को लौटते समय
हमारा स्वामी तुम्हारे
हलवाहे से कह रहा था कि कल
किसी कसाई और चर्मकार
को बुला लाना और बैल
जो बीमार हो गया है,
उसका मांस और खाल बेच
डालना। मैंने जो सुना था वह
मित्रता के नाते बता दिया।
अब तेरी इसी में भलाई है
कि सुबह तेरे आगे
चारा डाला जाए तो तू उसे
जल्दी से उठकर खा लेना और
स्वस्थ बन जाना, फिर
हमारा स्वामी तुझे स्वस्थ
देखकर तुझे मारने
का इरादा छोड़ देगा।’’
यह बात सुनकर बैल भयभीत
हो गया-‘‘भाई, ईश्वर तुझे
सदा सुखी रखे। तेरे कारण मेरे
प्राण बच गए। अब मैं
वही करूंगा जैसा तूने कहा है।’’
गधे और बैल की बातें सुनकर
व्यापारी ठहाका लगाकर
हंस पड़ा।
उसकी स्त्री को इस बात से
बड़ा आश्चर्य हुआ। वह पूछने
लगी कि तुम अकारण
ही क्यों हंस पड़े ?
व्यापारी ने कहा-‘‘यह बात
बताने की नहीं है, मैं सिर्फ
यह कह सकता हूं कि मैं बैल और
गधे की बातें सुनकर हंसा हूं।’’
स्त्री ने कहा, ‘‘मुझे भी वह
विद्या सिखाओ, जिससे तुम
पशुओं की बोली समझ लेते हो।’’
इस पर व्यापारी ने इन्कार
कर दिया।
स्त्री बोली-‘‘आखिर तुम मुझे
यह क्यों नहीं सिखाते ?’’
व्यापारी बोला-‘‘अगर मैंने
तुम्हें यह विद्या सिखाई
तो मैं जीवित नहीं रहूंगा।’’
स्त्री ने कहा-‘‘तुम झूठ बोले
रहे हो। क्या वह आदमी,
जिसने तुम्हें यह
विद्या सिखाई थी, सिखाने
के बाद मर गया था ? तुम कैसे
मर जाओगे ? कुछ भी हो, मैं
तुमसे यह विद्या सीखकर
ही रहूंगी। अगर तुम मुझे
नहीं सिखाओगे, तो मैं प्राण
त्याग दूंगी।’’
यह कहकर वह
व्यापारी की स्त्री घर में आ
गई और
अपनी कोठरी का दरवाजा बंद
करके रात भर
चिल्लाती रही और गाली-
गलौज करती रही।
व्यापारी रात
को तो किसी तरह सो गया,
लेकिन दूसरे दिन
भी वही हाल देखा तो उसने
स्त्री को समझाया, ‘‘तू बेकार
जिद्द करती है। यह
विद्या तेरे सीखने योग्य
नहीं है।’’
स्त्री ने कहा, ‘‘जब तक तुम मुझे
यह भेद नहीं बताओगे, मैं
खाना-पीना छोड़े रहूंगी और
इसी प्रकार
चिल्लाती रहूंगी।’’
इस पर व्यापारी तनिक
क्रोधित हो उठा और
बोला-‘‘अरी मूर्ख ! यदि मैं
तेरी बात मान लूंगा तो तू
विधवा हो जाएगी। मैं मर
जाऊंगा।’’
स्त्री ने कहा-‘‘तुम
जियो या मरो मेरी बला से,
लेकिन मैं तुमसे यह सीखकर
ही रहूंगी कि पशुओं
की बोली कैसे
समझी जाती है।’’
व्यापारी ने जब देखा कि वह
महामूर्खा अपना हठ छोड़
ही नहीं रही है, तो उसने
अपने और ससुराल के
रिश्तेदारों को बुलाया ताकि वे
उस स्त्री को अनुचित हठ
छोड़ने के लिए समझाएं। उन
लोगों ने भी उस मूर्ख
स्त्री को हर प्रकार
समझाया, लेकिन वह
अपनी जिद्द से न हटी। उसे
इस बात की बिलकुल
चिन्ता न
थी कि उसका पति मर
जाएगा।
छोटे बच्चे मां की दशा देखकर
रोने लगे। व्यापारी की समझ
में ही नहीं आ रहा था कि वह
अपनी स्त्री को कैसे समझाए
कि इस विद्या को सीखने
का हठ ठीक नहीं है। वह
अजीब दुविधा में था ‘अगर मैं
बताता हूं, तो मेरी जान
जाती है और
नहीं बताता तो मेरी स्त्री रो-
रोकर मर जाएगी।’
इसी उधेड़बुन में वह अपने घर के
बाहर जा बैठा। तभी उसने
देखा कि उसका कुत्ता, उसके
मुर्गे को मुर्गियों के साथ
विहार करते देखकर गुर्राने
लगा है।
कुत्ते ने मुर्गे से कहा-‘‘तुझे
लज्जा नहीं आती कि आज के जैसे
दुखदायी दिन भी तू मौज-
मजा कर रहा है।’’
मुर्गे ने कहा-‘‘आज
ऐसी क्या बात हो गई कि मैं
आनन्द न करूं ?’’
कुत्ता बोला-‘‘आज हमारे
स्वामी अति चिन्तातुर है।
उसकी स्त्री की मति मारी गई
है और वह उससे ऐसे भेद को पूछ
रही है जिसे बताने से
हमारा मालिक तुरंत ही मर
जाएगा। लेकिन अब यदि वह
उसे वह भेद
नहीं बताएगा तो उसकी स्त्री रो-
रोकर मर जाएगी। इसी से
सारे लोग दुखी हैं और तेरे
अतिरिक्त कोई ऐसा नहीं है
जो मौज-मजे की बात
भी सोचे।’’
मुर्गा बोला-‘‘हमारा स्वामी मूर्ख
है, जो एक
ऐसी स्त्री का पति है
जो उसके अधीन नहीं है।
मेरी तो पचास मुर्गियां हैं
और सब मेरे अधीन हैं। अगर
स्वामी मेरे बताए अनुसार
काम करे, तो उसका दुख
अभी दूर हो जाएगा।’’
कुत्ते ने पूछा-‘‘वह क्या करे
कि उस मूर्ख स्त्री की समझ
वापस आ जाए ?’’
मुर्गे ने कहा-‘‘हमारे
स्वामी को चाहिए कि एक
मजबूत डंडा लेकर उस
कोठरी में जाए
जहां उसकी स्त्री चीख और
चिल्ला रही है।
दरवाजा अंदर से बंद कर ले और
स्त्री की जमकर पिटाई करे।
कुछ देर बाद
उसकी स्त्री अपना हठ छोड़
देगी।’’
मुर्गे की बात सुनकर
व्यापारी में जैसे नई चेतना आ
गई। वह उठा और एक
मोटा डंडा लेकर उस
कोठरी में जा पहुंचा जिसमें
बैठी उसकी स्त्री चीख-
चिल्ला रही थी।
दरवाजा अंदर से बंद करके
व्यापारी ने स्त्री पर डंडे
बरसाने शुरू कर दिए। कुछ देर
चीख-पुकार करने पर भी जब
स्त्री ने देखा कि डंडे पड़ते
ही जा रहे हैं, तो वह
घबरा उठी। वह पति के
पैरों पर गिरकर कहने
लगी-‘‘अब हाथ रोक लो, अब
मैं कभी ऐसी जिद्द
नहीं करूंगी।’’
इस पर व्यापारी ने हाथ
रोक लिया और मुर्गे को मन-
ही-मन धन्यवाद दिया जिसके
सुझाव से उसकी पत्नी सीधे
रास्ते पर आ गई थी।