Saturday, 3 December 2011

दो रोटी के खातिर सपने मेँ खोए तीन साधु(पंचतंत्र)

ज्ञान की खोज में एक बार
तीन साधु हिमालय पर
जा पहुंचे। वहां पहुंचकर
तीनों साधुओं को बहुत भूख
लगी। देखा तो उनके पास
तो मात्र
दो ही रोटियां थी। उन
तीनों ने तय किया कि वो भूखे
ही सो जाएंगे। ईश्वर जिसके
सपने में आकर रोटी खाने
का संकेत देंगे वो ही ये
रोटियां खाएगा।
ऐसा कहकर तीनों साधु
सो गए।
आधी रात को तीनों साधु उठे
और एक-दूसरे को अपना-
अपना सपना सुनाने लगे। पहले
साधु ने कहा- मैं सपने में एक
अनजानी जगह
पहुंचा वहां बहुत
शांति थी और वहां मुझे ईश्वर
मिले। और उन्होंने मुझे
कहा कि तुमने जीवन में
सदा त्याग ही किया है।
इसलिए ये रोटियां तुम्हें
ही खानी चाहिए।
दूसरे साधु ने कहा कि- मैंने
सपने में देखा कि भूतकाल में
तपस्या करने के कारण में
महात्मा बन गया हूं और
मेरी मुलाकात ईश्वर से
होती है और वे मुझे कहते हैं
कि लंबे समय तक कठोर तप
करने के कारण रोटियों पर
सबसे पहला हक तुम्हारा है,
तुम्हारे मित्रों का नहीं।
अब तीसरे साधु
की बारी थी उसने कहा मैंने
सपने में कुछ नहीं देखा।
क्योंकी मैने
वो रोटियां खा ली हैं। यह
सुनकर दोनों साधु क्रोधित
हो गए। उन्होंने तीसरे साधु
से पूछा- यह निर्णय लेने से
पहले तुमने हमें
क्यों नहीं उठाया? तब तीसरे
साधु ने कहा कैसे उठाता? तुम
दोनों तो ईश्वर से बातें कर
रहे थे। लेकिन ईश्वर ने मुझे
उठाया और भूखे मरने से
बचा लिया।
बिल्कुल सही कहा गया है
कि जीवन-मरण का प्रश्न
हो तो कोई किसी का मित्र
नहीं होता व्यक्ति वही काम
करता है जिससे उसका जीवन
बच सके।

राजकन्या ने राजकुमार के पेट से सर्प निकाला(पंचतंत्र)

किसी नगर में देवशक्ति नाम
का एक राजा रहता था।
उसके पुत्र के पेट में एक सर्प
था। पेट में रहने वाले उस सर्प
के कारण दिन-प्रतिदिन वह
लड़का दुर्बल
होता जा रहा था। विविध
प्रकार के उपचार किए जाने
पर भी किसी प्रकार
उसका स्वास्थ्य सुधरने में आ
ही नहीं रहा था। इससे
राजकुमार अपने जीवन से
निराश हो अपने घर से विदेश
चला गया। वहां एक नगर में
वह भिक्षाटन
द्वारा अपनी आजीविका चलाने
लगा। रात्रि को वह
किसी देवालय में
सो जाया करता था।
जिस नगर में उस राजकुमार ने
शरण ली थी उसके
राजा का नाम बलि था।
उसकी दो कन्याएं
थीं जो युवती हो चुकी थीं।
सूर्योदय होने पर वे
दोनों कन्याएं अपने पिता के
पास जाकर उसके चरण-स्पर्श
किया करती थीं। एक दिन
की बात है कि प्रातःकाल
इस प्रकार जाने पर एक
कन्या ने चरण-स्पर्श करके
कहा, “महाराज! आपकी जय
हो। आपकी ही कृपा से मुझे
सम्पूर्ण सुख-भोगने
को मिला है।” दूसरी ने कहा,
“महाराज! मैं अपने कर्मफल
का उपभोग करती हूँ।”
दूसरी कन्या के वाक्य
को सुनकर
राजा को बड़ा क्रोध आया।
उसने अपने
मंत्री को बुलाया और बोला,
“इस कटुभाषिणी को यहां से ले
जाकर किसी परदेशी के साथ
इसका विवाह कर दो। जिससे
कि यह अपने कर्मफल
का उपयोग कर सकें।”
महाराज की आज्ञा पाकर
मंत्री ने अपने दूत भेजकर
पता लगवाया कि नगर में
किस प्रकार का कोई
व्यक्ति मिल सकता है
अथवा नहीं। सौभाग्य से
वही उदरस्थ सर्प
वाला राजकुमार उनको मिल
गया। उन्होंने उसके साथ
ही राजकुमारी का विवाह
कर दिया। राजकुमारी ने
प्रसन्न मन से
उसको अपना पति स्वीकार
किया और फिर उसको लेकर
किसी अन्य देश को चल दी।
सुदूर देश के एक नगर में पहुंचकर
वह एक सरोवर के किनारे
रुकी और अपने
पति की रक्षा के लिए सेवक
को नियुक्त कर स्वयं अपने
परिचालकों के साथ घी, तेल,
नमक तथा चावल आदि लेने के
लिए बाजार चली गई। इस
प्रकार जब वह भोजन-
सामग्री आदि लेने के लिए
बाजार चली गई।
इस प्रकार जब वह भोजन-
सामग्री लेकर अपने स्थान पर
लौटी तो उसने
देखा कि राजकुमार
किसी सर्प के बिल पर सर
रखकर सोया हुआ है और उसके
मुख से अपने फण को निकालकर
एक सर्प हवा खा रहा है।
उधर जिस बिल पर उसके
पति का सिर था उससे भी एक
सर्प निकलकर उसी प्रकार
वायु का सेवन कर रहा है। उन
दोनों सर्पों ने जब एक-दूसरे
को देखे तो दोनों के नेत्र
क्रोध से लाल हो गए। बिल
वाले सर्प ने क्रोधातुर होकर
उदरस्थ सर्प से कहा, “अरे
दुष्ट! इस सर्वांग सुन्दर
राजकुमार को तुम इस प्रकार
कष्ट क्यों दे रहे हो?” उसके
उत्तर में दूसरा सर्प बोला,
“इस विवर में रखे
स्वर्णमुद्राओं से भरे
दोनों घड़ों को तुमने
क्यों दूषित कर रखा है?” इस
प्रकार परस्पर प्रश्न करके वे
एक-दूसरे के रहस्य खोलने लगे।
थोड़ी देर बाद विवर सर्प ने
कहा, “क्या तुम्हारी यह
औषधि कोई
नहीं जानता कि पुरानी कांजी और
काली सरसों को पीसकर गर्म
जल के साथ पीने से तुम मर
सकते हो।” मुख में निकले सर्प
ने भी उसी प्रकार कहा,
“तुम्हारी भी इस
औषधि को क्या कोई
नहीं जानता कि गर्म जल
अथवा तेल को विवर में डालने
से तुम मर सकते हो?”
वह राजकन्या वृक्ष की ओट में
छिपी उनके वार्तालाप
को सुन रही थी। उसने फिर
विलम्ब नहीं किया। उसने
विवर में डालने के लिए जल
को खूब गर्म करके उसमें
डाला और कांजी और
काली सरसों का पेय बनाकर
उसने अपने
पति को पिला दिया। इस
प्रकार उसने
दोनों सर्पों को उनके बताए
उपाय से मार डाला।
इस प्रकार उसने अपने पति के
नीरोग कर दिया और फिर
बिल में रखे सोने से भरे
घड़ों को भी निकलवा लिया।
अपने पति और सेवकों को लेकर
उस धन के साथ वह अपने
ही नगर लौट आई। उसे इस
अवस्था में देखकर उसके माता-
पिता ने उसका आदर-सत्कार
किया और उसके दिन आनन्द से
बीतने लगे। अपने पूर्वसंचित
कर्मों का फल प्राप्त कर वह
सुखी हो गई।

मुँडन का पर्व(पंचतंत्र)

एक बार एक परम
शक्तिशाली और
यशस्वी प्रतापी राजा था।
उसका नाम नंद था। उसके
मंत्री का नाम वररुचि था।
वह
सभी शास्रों का ज्ञाता और
विचारक था। वह
अपनी पत्नी को बहुत
चाहता था।
एक बार किसी बात पर
उसकी पत्नी से उसका कुछ
झगड़ा हो गया। पत्नी उससे
नाराज हो गई और अनशन
करके प्राण देने पर तुल गई।
वररुचि ने उसे बहुत
मनाया और पूछा, ‘बताओ- मैं
तुम्हारी खुशी के लिए
क्या करूं?’ पत्नी ने कहा- ‘तुम
अपना सिर मुंडवाओ और मेरे
चरणों में प्रणाम करो।’
वररुचि ने ऐसा ही किया।
उसकी पत्नी प्रसन्न हो गई।
इसी प्रकार एक बार
राजा नंद
की पत्नी भी क्रोध करके
कलह मचाने लगी।
राजा भी अपनी पटरानी को बहुत
प्यार करता था। इसलिए
उसने उससे पूछा- ‘तुम्हें प्रसन्न
करने के लिए मैं क्या करुं?’
पत्नी बोली-‘तुम घोड़े
की तरह अपने मुंह में लगाम
लगा लो। फिर मैं तुम पर
सवारी करुंगी। तब तुम घोड़े
की तरह हिनहिनाना!’
राजा नंद ने विवश होकर
पत्नी को प्रसन्न करने के
लिए ऐसा ही किया। अगले
दिन राजसभा ने नंद ने
महामंत्री वररुचि को मुंडित
केश देखकर पूछा-‘अरे
महामंत्री, तुमने किस पर्व
पर यह मुंडन करवा लिया?’
चतुर महामंत्री से कुछ
भी छिपा हुआ नहीं था। उसने
कहा-‘महाराज,
स्त्री की याचना पर
तो लोग घोड़े की तरह
हिनहिनाने भी लगते हैं, केश
मुंडाना तो कुछ भी नहीं है।’
राजा लज्जित होकर चुप रह
गया।

रक्त कौतुक(लेखक-दीपक शर्मा)

''कुत्ता बँधा है क्या?'' एक
अजनबी ने बंद फाटक
की सलाखों के आर-पार
पूछा। फाटक के बाहर एक
बोर्ड टँगा था- 'कुत्ते से
सावधान!'
ड्योढ़ी के चक्कर
लगा रही मेरी बाइक रुक
ली। बाइक मुझे उसी सुबह
मिली थी। इस शर्त के
साथ कि अकेले उस पर
सवार होकर मैं घर
का फाटक पार
नहीं करूँगा। हालाँकि उस
दिन मैंने आठ साल पूरे किए
थे।
''उसे पीछे आँगन में
नहलाया जा रहा है।''
इतवार के इतवार माँ और
बाबा एक दूसरे की मदद
लेकर उसे ज़रूर
नहलाया करते। उसे साबुन
लगाने
का ज़िम्मा बाबा का रहता और
गुनगुने पानी से उस साबुन
को छुड़ाने
का ज़िम्मा माँ का।
''आज तुम्हारा जन्मदिन
है?'' अजनबी हँसा- ''यह
लोगे?''
अपने बटुए से बीस रुपए
का एक नोट उसने
निकाला और फाटक
की सलाखों मे से मेरी ओर
बढ़ा दिया।
''आप कौन हो?'' चकितवंत
मैं उसका मुँह ताकने लगा।
अपनी गरदन खूब
ऊँची उठानी पड़ी मुझे।
अजनबी ऊँचे कद का था।''कहीं नहीं देखा मुझे?'' वह
फिर हँसने लगा।
''देखा है।'' मैंने कहा।
''कहाँ?''
ज़रूर देख रहा था मैंने उसे,
लेकिन याद नहीं आया मुझे,
कहाँ।
टेलीफ़ोन की घंटी सुन कर
इधर आ
रही माँ हमारी ओर बढ़
आईं। टेलीफ़ोन के कमरे से
फाटक दिखाई देता था।
''मुझे नहीं पहचाना?''
आगंतुक हँसा।
''नहीं। नहीं पहचाना।''
माँ मुझे घसीटने लगीं।
फाटक से दूर। मैं
चिल्लाया, ''मेरा बाइक।
मेरा बाइक...''
आँगन में पहुँच लेने के बाद
ही माँ खड़ी हुई।
'हिम्मत देखो उसकी।
यहाँ चला आया...''
''कौन?'' बाबा वुल्फ़ के
कान थपथपा रहे थे।
जो सींग के समान
हमेशा ऊपर की दिशा में
खड़े रहते।
वुल्फ़ को उसका नाम छोटे
भैय्या ने दिया था-
''भेड़िए औऱ कुत्ते एक साझे
पुरखे से पैदा हुए हैं।'' तीन
साल पहले वही इसे
यहाँ लाए थे। ''जब तक
अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई
करने हेतु मैं यह शहर
छोडूँगा, मेरा वुल्फ़
आपकी रखवाली के लिए
तैयार हो जाएगा।'' और
सच ही में डेढ़ साल के अंदर
वुल्फ़ ने अपने विकास
का पूर्णोत्कर्ष प्राप्त
कर लिया था। चालीस
किलो वज़न, दो फुट
ऊँचाई, लंबी माँस-पेशियाँ,
फनाकार सिर, मज़बूत
जबड़े, गुफ़्फेदार दुम और
चितकबरे लोमचर्म पर भूरे
और काले आभाभेद।
''हर बात समझने में तुम्हें
इतनी देर क्यों लग
जाती है?'' माँ झल्लायी-
''अब क्या बताऊँ कौन है?
ख़ुद क्यों नहीं देख आते कौन
आया है? वुल्फ़ को मैं
नहला लूँगी...''
''कौन है?'' बाबा बाहर
आए तो मैं भी उनके पीछे
हो लिया।
''आज कुणाल का जन्मदिन
है।'' अजनबी के हाथ में
उसका बीस का नोट
ज्यों का त्यों लहरा रहा था।
''याद रख कचहरी में धरे
तेरे बाज़दावे
की कॉपी मेरे पास
रखी है। उसका पालन न
करने पर तुझे सज़ा मिल
सकती है...''
''यह तुम्हारे लिए है...''
अजनबी ने बाबा की बात
पर तार्किक ध्यान न
दिया औऱ बेखटके फाटक
की सलाखों में से
अपना नोट मेरी ओर
बढ़ाने लगा।
''चुपचाप यहाँ से फूट ले।''
बाबा ने मुझे
अपनी गोदी में
उठा लिया- ''वरना अपने
अलसेशियन से तुझे
नुचवा दूँगा...।''
वह गायब हो गया।
''बाज़दावा क्या होता है?''
मैंने बाबा के कंधे
अपनी बाहों में भर लिए।
''एक ऐसा वादा जिसे
तोड़ने पर
कचहरी सज़ा सुनाती है...।''
''उसने क्या वादा किया?''
''अपनी सूरत वह हमसे
छिपा कर रखेगा...''
''क्यों?''
''क्योंकि वह
हमारा दुश्मन है।''
इस बीच टेलीफोन
की घंटी बजनी बंद हो गई
और बाबा आँगन में लौट
आए।
दोपहर में जीजी आईं। एक
पैकेट के साथ।
''इधर आ।'' आते ही उन्होंने
मुझे पुकारा, ''आज
तेरा जन्मदिन है।''
मैं दूसरे कोने में भाग
लिया।
''वह नहीं आया?'' माँ ने
पूछा।
''नहीं'' जीजी हँसी- ''उसे
नहीं मालूम मैं यहाँ आई हूँ।
यही मालूम है मैं बाल
कटवा रही हूँ...''
''दूसरा आया था।'' माँ ने
कहा, ''जन्मदिन का इसे
बीस रुपया दे रहा था,
हमने भगा दिया...''
''इसे मिला था?''
जीजी की हँसी गायब
हो गई।
''बस। पल, दो पल।''
''कुछ बोला क्या? इससे?''
''हमने उसे कुछ बोलने
का मौका दिया ही कहाँ?''
''इधर आ।'' जीजी ने फिर
मुझे पुकारा, ''देख, तेरे लिए
एक बहुत बढ़िया ड्रेस
लाई हूँ...''
मैं दूसरे कोने में भाग
लिया।
वे मेरे पीछे भागीं।
''क्या करती है?'' माँ ने
उन्हें टोका,
''आठवा महीना है तेरा।
पागल है तू?''
''कुछ नहीं बिगड़ता।''
जीजी बेपरवाही से
हँसी से हँसी- ''याद नहीं,
पिछली बार
कितनी भाग-दौड़
रही थी फिर भी कुछ
बिगड़ा था क्या?''
''अपना ध्यान रखना अब
तेरी अपनी ज़िम्मेदारी है।''
माँ नाराज़ हो ली- ''इस
बार मैं तेरी कोई
ज़िम्मेदारी न लूँगी...''
''अच्छा।'' जीजी माँ के
पास जा बैठीं, ''आप
बुलाइए इसे।
आपका कहा बेकहा नहीं जाता...''
''इधर आ तो...'' माँ ने
मेरी तरफ़ देखा।
अगले पल मैं उनके पास
जा पहुँचा।
''अपना यह नया ड्रेस देख
तो।'' जीजी ने अपने पैकेट
की ओर अपने हाथ बढ़ाए।
''नहीं।'' जीजी की लाई
हुई हर चीज़ से मुझे चिढ़
थी। तभी से जब से मेरे
मना करने के बावजूद वे
अपना घर छोड़कर उस
परिवार के साथ रहने
लगी थीं, जिसका प्रत्येक
सदस्य मुझे घूर-घूर कर
घबरा दिया करता।
''तू इसे नहीं पहनेगा?''
माँ ने पैकेट की नई कमीज़
और नई नीकर मेरे सामने
रख दी, ''देख तो,
कितनी सुंदर है।'बाहर फाटक पर वुल्फ़
भौंका।
''कौन है बाहर?''
बाबा दूसरे कमरे में टी.वी.
पर क्रिकेट मैच देख रहे थे,
''कौन देखेगा?''
''मैं देखूँगी।'' माँ हमारे
पास से उठ गईं- ''और कौन
देखेगा?''
मैं भी उनके पीछे जाने के
लिए उठ खड़ा हुआ।
''वह आदमी कैसा था,
जो सुबह आया था?''
जीजी धीरे से फुसफुसाईं।
अकेले में मेरे साथ वे अकसर
फुसफुसाहटों में बात
करतीं।
अपने कदम मैंने वहीं रोक
लिए और जीजी के निकट
चला आया। उस अजनबी के
प्रति मेरी जिज्ञासा ज्यों की त्यों बनी हुई
थी।
''वह कौन है?'' मैंने पूछा।
''एक ज़माने का एक
बड़ा कुश्तीबाज़।''
जीजी फिर फुसफुसाईं-
''इधर, मेरे पास आकर बैठ।
मैं तुझे सब बताती हूँ।''
''क्या नाम है?''
''मंगत पहलवान...''
''फ्री-स्टाइल वाला?''
कुश्ती के बारे में
मेरी जानकारी अच्छी थी।
बड़े भैय्या की वजह से
जिनके बचपन के सामान में
उस समय के बड़े
कुश्तीबाज़ों की तस्वीरें
तो रहीं ही,
उनकी किशोरावस्था के
ज़माने का डायरियों में
उनके दंगलों के ब्यौरे
भी दर्ज़ थे। बेशक बड़े
भैय्या अब दूसरे शहर में
रहते थे,
जहाँ उनकी नौकरी थी,
पत्नी थी, दो बेटे थे
लेकिन जब भी वे इधर
हमारे पास आते मेरे साथ
अपनी उन डायरियों और
तस्वीरों को ज़रूर कई-कई
बार अपनी निगाह में
उतारते और उन दक्ष
कुश्तीबाज़ों के होल्ड
(पकड़), ट्रीप (अडंगा) और
थ्रो (पछाड़) की देर तक
बातें करते।
''हाँ। फ्री-स्टाइल''
जीजी मेरी पुरानी कमीज़
के ब़टन खोलने लगीं- ''और
वेट क्लास में सुपर हैवी-
वेट...''
''सौके.जी. से ऊपर?'' मुझे
याद आ गया। अजनबी मंगत
पहलवान ही था।
उसकी तस्वीर मैंने देख
रखी थी। जोड़ बंद कर, दस
साल पहले,
जितनी भी कुश्तियाँ उसने
लड़ी थीं, मुकाबले में खड़े
सभी पहलवानों को हमेशा हराया था उसने।
बड़े भैया की वे
डायरियाँ दस साल
पुरानी थीं, इसीलिए
इधर बीते दस सालों में
लड़ी गई
उसकी लड़ाइयों के बारे में
मैं कुछ न जानता था।
''हाँ, एक सौ सात...''
''एक सौ सात के.जी.?'' मैंने
अचंभे से अपने हाथ फैलाए।
''हाँ। एक सौ सात के.जी.।''
हँस कर जीजी ने मेरी गाल
चूम ली और अपनी लाई हुई
नई कमीज़ मुझे पहनाने
लगीं।
''वह हमारा दुश्मन कैसे
बना?''
''किसने कहा वह
हमारा दुश्मन है?''
''बाबा ने...''
''वह फिर आ धमका है।''
माँ कमरे के अंदर चली आईं-
''वुल्फ़ की भौंक देखी? अब
तुम इसे लेकर इधर
ही रहना। उस तरफ़
बिल्कुल मत आना...।''
माँ फौरन बाहर चली गईं।
वुल्फ़ की गरज ने
जीजी का ध्यान बाँट
दिया। नई कमीज़ के बटन
बंद कर रहे उनके हाथ
अपनी फुरती खोने लगे।
चेहरा भी उनका फीका और
पीला पड़ने लगा।
अपने आपको जीजी के
हाथों से छुड़ा कर मैंने
बाहर भाग लेना चाहा।
''नीकर नहीं बदलोगे?''
जीजी की फसफसाहट और
धीमी हो ली- ''पहले उधर
चलोगे?''
''हाँ।'' मैंने अपना सिर
हिलाया। दबे कदमों से हम
टेलीफ़ोन वाले कमरे में
जा पहुँचे।
फाटक खुला था और
ड्योढ़ी में मंगत पहलवान
वुल्फ़ के साथ
गुत्थमगुत्था हो रहा था।
उसके एक हाथ में वुल्फ़
की दुम थी और दूसरे हाथ
में वुल्फ़ के कान। वुल्फ़
की लपलपाती जीभ
लंबी लार
टपका रही थी और कुदक
कर वह मंगत पहलवान
को काट खाने की ताक में
था।
''अपने गनर के साथ फौरन
मेरे घर चले आओ।' -
हमारी तरफ़ पीठ किए
बाबा फ़ोन पर बात कर
रहे थे, ''तलाक ले
चुका मेरा पहला दामाद
इधर उत्पात मचाए है...''
दामाद? बाबा ने मंगत
पहलवान
को अपना दामाद
कहा क्या? मतलब,
जीजी की एक
शादी हो चुकी थी? और
वह भी मंगत पहलवान के
संग?
मैंने जीजी की ओर देखा।
वह बुरी तरह काँप
रही थीं। ''माँ''- घबराकर
मैंने दरवाज़े की ओट में,
ड्योढ़ी की दिशा में आँखें
गड़ाए
खड़ी माँ को पुकारा।
जीजी लड़खड़ाने लगीं।
माँ ने लपककर उन्हें
अपनी बाहों का सहारा दिया और
उन्हें अंदर सोने वाले कमरे
की ओर ले जाना चाहा।
लेकिन जीजी वहीं फ़र्श
पर बीच रास्ते गिर गईं
और लहू गिराने
लगी टाँगों के रास्ते।
''पहले डॉक्टर बुलाइए
जल्दी...''
माँ बाबा की दिशा में
चिल्लाईं, ''बच्चा गिर
रहा है...''
बाबा टेलीफ़ोन पर नए
अंक घुमाने लगे। जब तक
बाबा के गनर वाले दोस्त
पहुँचे वुल्फ़ निष्प्राण
हो चुका था और मंगत
पहलवान ढीला और मंद।
और जब तक डॉक्टर पहुँचे
जीजी का आधा शरीर लहू
से नहा चुका था। अगले
दिन बाबा ने मुझे स्कूल न
भेजा। बाद में मुझे
पता चला उस दिन
की अख़बार में मंगत
पहलवान
की गिरफ्तारी के
समाचार के साथ हमारे
बारे में भी एक
सूचना छपी थी- माँ और
बाबा मेरे नाना-नानी थे
और
मेरी असली माँ जीजी थीं और
असली पिता मंगत
पहलवान।

बुद्धिमान बंजारा

Ek bar ek banjara met
(multani mitti) bailon
par ladkar delhi men
bechne ke liye le ja raha
tha.wo ganw se hokar
ja raha tha.uski bahut
sari met ganw men hi
bik gayi.bailon par lade
boro ka santulan
banaye rakhne ke liye
usne apne naukron se
boron me ek taraf baloo
(silt) bharne ke lie kaha.
Naukron ne un boron
men ek taraf baloo bhar
dia(wo log rajsthan se
hokar gujar rahe the
jisse wahan baloo bahut
tha) jisse unka
shantulan ho gaya.udhar
se ek sajjan gujar rahe
the unhone jab boron se
baloo girte dekha to
naukron se bole ki ap
muft men in bechare
bailon ko kyon mar
rahe,ap is met ke boron
ko ek men bandh
dijiye.naukron me kaha
ki ap thik kah rahe lekin
hm apne malik ka adesh
ka palan karte isliye ap
unse kahiye.wo sajjan
banjare ke pas gaye aur
usse wahi bat
kahi.banjare ne un
sajjan se puchha ki ap
kahan ja rahe aur kahan
rahte.sajjan ne kaha
"ham paise kamane ke
lie delhi men aye the
lekin hm bimar ho gaye
aur sare paise kharch ho
gaye isliye hm apne
ghar durjanpur wapas ja
rahe."
banjare ne uski bat ni
mani(kyonki wo khud
apni progress nahi kar
paya tha aur dusre ko
advice de raha tha) aur
aise hi naukron ko
chalne ko kaha.delhi
pahunchkar usne bailon
ko ghas charne ke liye
jungle men bhej dia.us
banjare ki met khub
biki.delhi ke badshah us
samay bimar the aur
doctor ne unhen
rajasthan men rahne ke
kie kaha jisse unki
bimari dur ho sake
kyonki baloo par rahna
unke bimari ka ilaj tha
lekin wo rajsthan men
kaise rah sakte
the .isliye ek upay socha
gaya ki uahan ki baloo
yahan le aya jaye.isliye
kuchh naukar baloo lane
ke liye bheje gaye unhon
delhi men hi yahan ki
baloo dekhi isliye unhone
banjare se use kharidne
ke liye uski kimat
puchi.banjare ne kaha ki
jo met ki kimat hai wahi
iski hai kyonki ye uske
ek taraf ladkar aya
tha.is tarah uska baloo
bhi bik gaya agar wo
sajjan ki bat man leta
to usko ghata lgta.
Isliye hame apni bat hi
sunni chahiye aur jo
hamse bade log
(mahapurush)hain unki
bat manni chahiye jisse
ham progress kar
sake.....