Sunday, 18 December 2011

राजकुमार का अदम्य साहस-8

जब जहाज किनारे
आकर
लगा तो राजकुमार ने
देखा कि वजीर
का लड़का वहां उपस्थ
था। राजकुमार ने
पद्मिनी से
उसका परिचय कराते
हुए कहा, “यह
मेरा साथी है। सागर
की यात्रा आरंभ करने
तक मेरे दु:ख-सुख में
इसने बराबर
मेरा साथ दिया।”
वजीर
का लड़का पद्मिनी क
गदगद् हो गया। उस
दिन वहीं रहने के
लिए उसने एक भवन
की व्यवस्था कर
रक्खी थी।
वहां पहुंचने पर
राजकुमार
को मैना की बात
याद आ गई।
राजकुमार ने कहा,
“हमें
यहां नहीं ठहराना।
और कोई भवन देखो।”
वजीर के लड़के ने
कहा, “आपके आने से
पहले मैं यहां के सारे
भवन देख चुका हूं। यह
सबसे अच्छा है।” पर
राजकुमार ने
उसकी एक न सुनी।
वजीर के लड़के ने दूसरे
भवन की खोज की।
दूसरा भवन उस भवन
के पास ही मिल
गया। वे लोग उसमें
ठहर गये। बड़ी देर
तक राजकुमार उसे
अपनी कहानी सुनात
फिर वे सो गये।
आधी रात के बाद
जोर की गड़गड़ाहट
हुई। वजीर
का लड़का उठकर
बाहर आया तो देखा,
पहला भवन गिरकर
मिट्टी में मिल
गया है। उसने
राजकुमार
की दूरंदेशी की भूरी-
भूरी प्रशंसा की।
पद्मिनी तो सो गई,
लेकिन राजकुमार
रात-भर तारे
गिनता रहा। भोर
होने से पहले
देखता क्या है कि एक
काला विषैला सांप
आया और
कुण्डली मारकर
पद्मिनी के जूते में बैठ
गया। राजकुमार
तो चिंतित होकर उस
घड़ी की प्रतीक्षा क
जूते में बैठे सांप
को मारा ही रहा थ
उसने तलवार निकाल
कर सांप के दो टुकड़े
कर डाले और बाहर
फैंक कर पद्मिनी के
उठने की राह देखने
लगा। थोड़ी देर में
पद्मिनी उठी।
उसकी थकान दूर
हो गई थी और उसके
चेहरे की कांति लौट
आई थी। उसने
मुस्करा कर
राजकुमार की ओर
देखा। राजकुमार
भी मुस्कराकर उसे
पास गया और कुछ देर
तक उसके मुलायम
बालों को सहलाता र
पद्मिनी मन ही मन
विभोर
हो रही थी कि उसे
अपने जीवन साथी के
रूप में एक ऐसा सुन्दर
और
पराक्रमी व्यक्ति म
गया।
वजीर के लड़के ने आगे
की यात्रा उड़नखटो
से करने का विचार
किया और एक
उड़नखटोला मंगवा भ
लेकिन राजकुमार ने
उसमें बैठने से साफ
इनकार कर दिया।
वजीर के लड़के
को बड़ा बुरा लगा,
पर राजकुमार के आगे
उसकी एक न चली। वे
घोड़ों पर सवार
होकर ही आगे बढ़े।
उड़नखटोले में कुछ और
लोग बैठ गये, लेकिन
थोड़ी दूर जाकर
उड़नखटोला धड़ाम से
नीचे आ गिरा और
उसमें बैठे सब
लोगों की जाने
चली गईं। राजकुमार
ने अनुभव
किया कि मैना की भ
थी।
मार्ग में मनमोहक
दूश्यों को देखते हुए वे
लोग आगे बढ़ते गये।
अपने द्वीप से
पद्मिनी कभी बाहर
नहीं गई थी। अब
लम्बी-
चौड़ी दुनिया उसके
सामने थी। तरह तरह
के लोग थे, तरह-तरह
की उनकी पोशाकें
थीं, तरह-तरह के
उनके आचार-विचार
थे। राजकुमार ने
कहा, “पद्मिनी, अब
हम एक ऐसे बाबा के
आश्रम में चल रहे हैं,
जिनके हृदय में प्रेम
का दरिया बहता है।
जो भी उनके पास
जाता है, उसका मन
जीत लेते हैं। जिन
खड़ाऊ को पहनकर मैंने
सागर पार
किया था, वे उन्होंने
ही दिये थे।”
पद्मिनी आश्चर्य कर
रही थी कि आखिर
राजकुमार ने उस
विशाल सागर को कैसे
पार किया! अब
उसका भेद खुल गया।
पद्मिनी ने कहा,
“राजकुमार, संत लोग
मोह-माया से परे
होते हैं, लेकिन कोई-
कोई संत ऐसे भी होते
हैं, जो लोगों के दु:ख-
दर्द को अपने ऊपर ले
लेते हैं।” कहते-कहते
पद्मिनी के भीतर जैसे
करुणा का स्रोत फूट
पड़ा। उसने
उसकी वाणी को अवरू
कर दिया।
बाबा का आश्रम अब
कुछ दूरी पर था।
राजकुमार ने कहा,
“हमें देर भले
ही हो जाये, पर हम
रुकेंगे बाबा के आश्रम
में ही।”
रास्ता काटने के लिए
राजकुमार
पद्मिनी को अच्छे-
अच्छे किस्से
सुनाता रहा। वह
उन्हें ध्यान से
सुनती रही।
अंत में आसमान जब
टिमटिमाते तारों से
जगमगा उठा, वे
आश्रम में पहुंच गये।
बाबा कई दिन से
उनकी राह देख रहे
थे। इतनी देर कैसे
हो गई, यह सोचकर
उनका मन व्याकुल
हो उठता था।
राजकुमार
को पद्मिनी के साथ
सामने देखकर
उनका हृदय हर्ष से
पुलकित हो उठा।
उन्होंने बड़ी ममता से
उनका स्वागत
किया और आश्रम के
सर्वोत्कृष्ट कक्ष में
उन्हें ठहराया। उस
कक्ष में कोई दीवार
नहीं थी। हरी-
भरी वल्लरियों ने
एक-दूसरे से लिपट कर
उस कक्ष का निर्माण
किया था।
पद्मिनी उस कक्ष
को देखकर रोमांचित
हो उठी। बाबा ने
बड़े प्यार से कहा,
“तुम लोग बड़ा सफर
करके आये हो। थक गये
होंगे। कुछ खा-
पी लो और आराम से
सो जाओ।” रात
बढ़ती जा रही थी,
अंधकार
गाढ़ा हो रहा था,
पर उस घने अंधेरे में
भी आश्रम
की आत्मा अपनी माधु
रही थी। आश्रम के
अंतेवासियों ने अपने
शाही मेहमानों के
लिए नाना प्रकार के
व्यंजन तैयार कर दिये
थे। बड़े उल्लास के
वातावरण में
मेहमानों ने आश्रम
का प्रसाद पाया।
प्रत्येक वस्तु
इतनी स्वादिष्ट
थी कि राजकुमार और
पद्मिनी ने अनुभव
किया, मानों वह
किसी देवलोक में आये
हों। बाबा बराबर
उनके नीचे रहे और
उन्हें पुलकित देखकर
स्वयं आनंद विभोर
होते रहे। पद्मिनी ने
कहा, “मैं तो सोच
भी नहीं सकती थी क
में इस प्रकार मंगल
होगा। पर
संतों की महिमा को
जानता है।” यह
सुनकर बाबा से चुप
नहीं रहा गया।
बोले, “पद्मिनी,
आनंद भीतर की चीज़
है। जब
आदमी का अंतर
प्रमुदित होता है
तो बाहर सब कुछ
हरा-भरा दिखाई
देता है।” पद्मिनी ने
सिर हिला कर
बाबा के कथन
को स्वीकृति दी।
प्रसाद ग्रहण करने के
बाद सब सो गये।
बाबा ब्रह्म मुहूर्त में
उठ गये। उन्होंने
आश्रम का एक चक्कर
लगाया, गोशाला में
जाकर
गायों को प्यार
किया। तबतक
राजकुमार और
पद्मिनी उठकर
वहां आ गये। बाबा ने
हंसकर कहा,
“पद्मिनी, तुम इस
आश्रम में एक
भी बूढ़ा पेड़
नहीं पाओगी, और
देखो जब हम
गायों को पुचकारते
हैं, उनकी पीठ पर
हाथ फिरते हैं
तो उनके थनों से दूध
की धारा बहने
लगती है। पेड़-पौधे
और पशु-
पक्षी भी प्यार के
भूखे होते हैं।”
पद्मिनी ने आश्रम में
निगाह
डाली तो सचमुच उसे
एक भी बूढ़ा पेड़
दिखाई
नहीं दिया और
बाबा ने जब
गायों को दुधाया और
उनकी पीठ पर हाथ
फिराया तो उनके
थनों से दूध
की धाराएं बहने
लगीं।
पद्मिनी चकित रह
गई। ऐसा दृश्य उसने
पहले
कभी नहीं देखा था।
आश्रम में मेहमान एक
दिन रहना चाहते थे।
बाबा के प्रेम ने उन्हें
चार दिन रोक
लिया। वहां के
वातावरण में
पद्मिनी का मन
इतना रम
गया कि जब
विदा होने का समय
आया तो वह रोने
लगी। बाबा का दिल
भी भर आया। उन्होंने
कहा, “पद्मिनी,
आश्रम तुम्हारा है।
जब जी में आये, फिर आ
जाना।” राजकुमार
ने बाबा को खड़ाऊं
लौटा दिये और
उनका आशीर्वाद
लेकर आगे बढ़ चले।
राजगढ़ अभी दूर बहुत
दूर था। बाबा के
आश्रम से निकलते
ही अचानक
राजकुमार को उस
राजकन्या का ध्यान
आया, जिसे उसने वृक्ष
की जड़ से रोगमुक्त
किया था। राजा ने
उससे आग्रह
किया था कि वह
उनकी घोषणा के
अनुसार
पुत्री का वरण करे
और उनका आधा राज्य
ले ले। राजकुमार ने
अपने घोड़े
को उसी नगर की ओर
मोड़ दिया और कुछ
ही समय में
राजकुमार और
पद्मिनी उस नगर में
पहुंच गए।
राजा राजकुमार के
आगमन से बहुत
आनन्दित हुए और जब
उन्होंने
पद्मिनी को देखा उन
गदगद् हो गया।
उन्होंने राजकुमार
और पद्मिनी का पूरे
सम्मान के साथ
स्वागत किया।
राजा ने राजकुमार से
राजकुमारी को साथ
ले जाने का अनुरोध
किया तो राजकुमार
ने सहर्ष स्वीकार कर
लिया, लेकिन जब
राजा ने
अपना आधा राज्य देने
का प्रस्ताव
किया तो राजकुमार
ने उसे लेने में
असमर्थता प्रकट
की। राजकुमार ने एक
दिन वहां ठहर कर
राजा का आतिथ्य
स्वीकार किया और
अगले दिन
पद्मिनी और
राजकुमारी को साथ
लेकर राजगढ़ की ओर
रवाना हो गया।
उनका अगला पड़ाव
अब भभूत वाले
बाबा के यहां था।
मेहमानों का काफिल
उसी ओर बढ़
रहा था। सूर्य
की बाल-किरणें सारे
वातावरण
को बड़ी स्निग्धता प्
कर रही थीं। आकाश
निर्मल था।
पक्षी कलरव कर रहे
थे। सबके मन उमंग से
भरे थे। उन्हें राजगढ़
पहुंचने की जल्दी थी,
पर मार्ग के अनुपम
दूश्य उनके पैरों में
जंजीर डाल रहे थे।
पर्वत श्रृंखला पार
करते हुए तो वे इतने
अभिभूत हुए
कि घोड़ों पर से उतर
पड़े और उपत्यकाओं
की हरियाली तथा प
शिखरों पर
सुहावनी धूप
की सुनहरी चादर
देखकर सबके मन आनंद
से उछलने लगे।
पद्मिनी ने
प्रकृति की उस
छटा का जी-भर कर
पान करते हुए
राजकुमार का हाथ
पकड़ लिया। बोली,
“राजकुमार,
आदमी अगर
इतना ऊंचा उठ जाये,
इतना निर्मल
हो जाये
तो धरती पर स्वर्ग
उतर आये।” एक
अलौकिक आभा से
पद्मिनी का मुख-
मुण्डल दीप्त
हो रहा था। उसे
देखकर
ऐसा लगता था जैसे
इंद्रलोक की कोई
देवांगना इस
धरती पर आ गई हो।
वह
मुस्कराती थी तो प्य
के धवल निर्झर बहने
लगते थे। वह
हंसती थी तो सारी
पुष्पों से आच्छादित
हो उठती थी। बड़े
स्नेह से भीग कर
राजकुमार बार-बार
उस कोमलांगी की ओर
देखता था। उस
अनमोल
सम्पदा को पाकर वह
बार-बार अपने
भाग्य
को सराहता था। उसे
लगा, पर्वतों के
उतार-चढ़ाव से
पद्मिनी थक
जायेगी। किन्तु
पद्मिनी तो रुकने
का नाम ही नहीं ले
रही थी। उसने भावुक
होकर कहा,
“पद्मिनी तुम अब
घोड़े पर बैठ जाओ।
तुम्हारे पैर दर्द करने
लगेंगे।” पद्मिनी ने
बड़े उल्लास से कहा,
“क्यों तुम मुझे इस
आनंद से वंचित
करना चाहते हो?”
उसके इस उद्गार से
ऊंचे-ऊंचे पर्वत शिखर
निहाल हो गये,
उपत्यकाएं
मुस्करा उठीं और घने
गगनचुम्बी वृक्षों की
गहरी हो गई। जाते
समय राजकुमार ने वह
पर्वत-
माला बिना इधर-
उधर देखे योंही पार
कर ली थी, किन्तु
आज तो उसके साथ एक
ऐसा प्रकाशपुंज था,
जिसके आलोक में
भीतर-बाहर
कहीं भी अंधकार रह
नहीं सकता था। वे
लोग घोड़ों पर सवार
हो गये।
पर्वतों को लांघ कर
फिर मैदान में आ गये।
राजकुमार ने हंसकर
कहा, “हम लोग
भी कैसे हैं,
जहां घोड़ों पर
बैठना चाहिए था,
वहां बैठे नहीं, लेकिन
जहां पैदल चल सकते
थे, वहां घोड़ों पर
सवार हो गये हैं।”
पद्मिनी यह सुनकर
चुप न रह सकी।
बोली, “राजकुमार
आदमी पैदल चलता है
तो धरती को उसका
जाता है। पहाड़ों में
पैदल न
चलना पहाड़ों का अप
करना है।”
पद्मिनी की इस
बुद्धिमत्ता से
राजकुमार का रोम-
रोम पुलकित
हो उठा। वह क्षण
भर उसकी ओर
देखता रह गया।
बाबा का आश्रम अब
दूर नहीं था।
राजकुमार ने कहा,
“पद्मिनी, अब हम
उन बाबा के आश्रम में
पहुंच रहे हैं, जिन्होंने
मुझे एक
ऐसी चमत्कारी भभूत
दी थी, जिसे खाकर
मुझे कोई नहीं देख
सकता था और मैं
सबको देख
सकता था।” फिर कुछ
रुककर बोला,
“उसी भभूत को मुंह में
डालकर मैंने तुम्हारे
सिंहल द्वीप में प्रवेश
किया था।”
पद्मिनी ने कहा,
“तो तुम मेरे महल में
भी आये होंगे।”
“नहीं।” राजकुमार
बोला, “मैंने तुम्हारे
महल को बाहर से
देखा था।” “भीतर
क्यों नहीं आये?”
राजकुमारी ने
थोड़ा व्यग्र होकर
पूछा। “महल में
जाना चाहता था,
लेकिन जाने
क्या सोचकर मुझे डर
लगा। फाटक बंद था।
खोलने की हिम्मत
नहीं हुई। नगर
का एक चक्कर लगाकर
लौट आया। तभी मुझे
अचानक ध्यान
आया कि मैं अद्दश्य
तो हो गया हूं, पर
अपने असली रूप में कैसे
आऊंगा? जब मैं इस
चिन्ता में
डूबा था कि यही बा
आ खड़े हुए। मैंने उन्हें
अपनी चिन्ता बताई
तो उन्होंने भभूत
की एक डिब्बी और
दी और कहा कि इसे
खाओगे तो अपने
असली रूप में आ
जाओगे। यह कहकर
बाबा अंतर्धान
हो गये।”
पद्मिनी यह सुनकर
हंस पड़ी।

Saturday, 17 December 2011

कुएं का विवाह

एक बार राजा कॄष्णदेव
राय और तेनालीराम के
बीच किसी बात
को लेकर विवाद
हो गया। तेनालीराम
रुठकर चले गए। आठ-दस
दिन बीते,
तो राजा का मन
उदास हो गया।
राजा ने तुरन्त
सेवको को तेनालीराम
को खोजने भेजा।
आसपास का पूरा क्षेत्र
छान लिया पर
तेनालीराम
का कहीं अता-
पता नहीं चला।
अचानक राजा को एक
तरकीब सूझी। उसने
सभी गांवों में
मुनादी कराई
राजा अपने राजकीय
कुएं का विवाह
रचा रहे हैं, इसलिए
गांव के
सभी मुखिया अपने-अपने
गांव के कुओं को लेकर
राजधानी पहुंचे।
जो आदमी इस
आज्ञा का पालन
नहीं करेगा, उसे
जुर्माने में एक हजार
स्वर्ण मुद्राएं
देनी होंगी।
मुनादी सुनकर
सभी परेशान हो गए।
भला कुएं भी कहीं लाए-
ले जाए जा सकते हैं।
जिस गांव में
तेनालीराम भेष
बदलकर रहता था,
वहां भी यह
मुनादी सुनाई दी।
गांव
का मुखिया परेशान
था। तेनालीराम समझ
गए कि उसे खोजने के
लिए ही महाराज ने
यह चाल चली हैं।
तेनालीराम ने
मुखिया को बुलाकर
कहा “मुखियाजी, आप
चिंता न करें, आपने मुझे
गांव में आश्रय दिया हैं,
इसलिए आपके उपकार
का बदला में चुकाऊंगा।
मैं एक तरकीब
बताता हूं आप आसपास
के मुखियाओं
को इकट्ठा करके
राजधानी की ओर
प्रस्थान करें”। सलाह
के अनुसार
सभी राजधानीकी ओर
चल दिए। तेनालीराम
भी उनके साथ थे।
राजधानी के बाहर
पहुंचकर वे एक जगह पर
रुक गए। एक
आदमी को मुखिया का
संदेश देकर राजदरबार
में भेजा। वह
आदमी दरबार में
पहुंचा और तेनालीराम
की राय के अनुसार
बोला “महाराज!
हमारे गांव के कुएं
विवाह में शामिल होने
के लिए राजधानी के
बाहर डेरा डाले हैं। आप
मेहरबानी करके
राजकीय कुएं
को उनकी अगवानी के
लिए भेजें, ताकि हमारे
गांव के कुएं ससम्मान
दरबार के सामने
हाजिर हो सकें।
राजा को उनकी बात
समझते देर
नहीं लगी कि ये
तेनालीराम
की तरकीब हैं। राजा ने
पूछा सच-सच बताओ
कि तुम्हें यहाक्ल किसने
दी हैं? राजन! थोडे
दिन पहले हमारे गांव
में एक परदेशी आकर
रुका था। उसी ने हमें
यह तरकीब बताई हैं
आगंतुक ने जवाब दिया।
सारी बात सुनकर
राजा स्वयं रथ पर
बैठकर राजधानी से
बाहर आए और ससम्मान
तेनालीराम
को दरबार में वापस
लाए। गांव
वालो को भी पुरस्कार
देकर विदा किया।

Friday, 9 December 2011

भगवान पर भरोसा

जाड़े का दिन था और शाम
हो गयी थी। आसमान में
बादल छाये थे। एक नीम के पेड़
पर बहुत-से कौए बैठे थे। वे सब
बार-बार काँव-काँव कर रहे
थे और एक-दूसरे से झगड़ भी रहे
थे। इसी समय एक
छोटी मैना आयी और
उसी नीम के पेड़ की एक डाल
पर बैठ गयी। मैना को देखते
ही कई कौए उस पर टूट पड़े।
बेचारी मैना ने कहा—‘बादल
बहुत हैं, इसलिए आज
जल्दी अँधेरा हो गया है। मैं
अपना घोसला भूल गयी हूँ।
मुझे आज रात यहाँ रहने दो।’
कौओं ने कहा—‘नहीं, यह
हमारा पेड़ है। तू यहाँ से भाग
जा।’
मैना बोली—‘पेड़ तो सब
भगवान् के हैं। इस सर्दी में
यदि वर्षा हुई ओले पड़े
तो भगवान् ही हम लोगों के
प्राण बचा सकते हैं। मैं बहुत
छोटी हूँ, तुम्हारी बहिन हूँ,
मुझ पर तुम लोग दया करो और
मुझे भी यहाँ बैठने दो।’
कौओं ने कहा—‘हमें तेरी-
जैसी बहिन नहीं चाहिये। तू
बहुत भगवान् का नाम लेती है
तो भगवान् के भरोसे यहाँ से
चली क्यों नहीं जाती ? तू
नहीं जायगी तो हम सब तुझे
मारेंगे।’
कौए तो झगड़ालू होते ही हैं,
वे शाम को जब पेड़ पर बैठने
लगते हैं तब आपस में झगड़ा किये
बिना उनसे रहा नहीं जाता।
वे एक-दूसरे को मारते हैं और
काँव-काँव करके झगड़ते हैं।
कौन कौआ किस टहनी पर
रात को बैठेगा यह कोई
झटपट तै नहीं हो जाता।
उनमें बार-बार लड़ाई
होती है, फिर
किसी दूसरी चिड़िया को वे
अपने पेड़ पर तो बैठने ही कैसे
दे सकते थे। आपस की लड़ाई
छोड़कर वे मैना को मारने
दौड़े।
कौओं को काँव-काँव करके
अपनी ओर झपटते देखकर
बेचारी मैना वहाँ से उड़
गयी और थोड़ी दूर जाकर एक
आम के पेड़ पर बैठ गयी।
रात को आँधी आयी। बादल
गरजे और बड़े-बड़े ओले पड़ने लगे।
बड़े आलू-जैसे ओले तड़-तड़, भड़-
भड़ बंदूक की गोली-जैसे पड़ रहे
थे। कौए काँव-काँव करते
चिल्लाये; इधर-से-उधर
थोड़ा-बहुत उड़े; परंतु ओले
की मार से सब-के-सब घायल
होकर जमीन पर गिर पड़े।
बहुत-से कौए मर गये।
मैना जिस आम पर बैठी थी,
उसकी एक मोटी डाल आँधी में
टूट गयी। डाल भीतर से सड़
गयी थी और
पोली हो गयी थी। डाल
टूटने पर उसकी जड़ के पास पेड़
में एक खोंड़र हो गया।
छोटी मैना उसमें घुस गयी।
उसे एक भी ओला नहीं लगा।
सबेरा हुआ, दो घड़ी चढ़ने पर
चमकीली धूप निकली।
मैना खोंड़र में से निकली, पंख
फैलाकर चहककर उसने भगवान्
को प्रणाम किया और वह
उड़ी।
पृथ्वी पर ओले से घायल पड़े हुए
कौए ने मैना को उड़ते देखकर
बड़े कष्ट से
कहा—‘मैना बहिन ! तुम
कहाँ रही ?
तुमको ओलों की मार से किसने
बचाया ?’
मैना बोली—‘मैं आम के पेड़ पर
अकेली बैठी थी और भगवान्
की प्रार्थना करती थी।
दुःख में पड़े हुए असहाय
जीवको भगवान् के सिवा और
कौन बचा सकता है।’
लेकिन भगवान् केवल ओले से
ही नहीं बचाते और केवल
मैना को ही नहीं बचाते।
जो भी भगवान् पर
भरोसा करता है और भगवान्
को याद करता है, उसे भगवान्
सभी आपत्ति-विपत्ति में
सहायता देते हैं और
उसकी रक्षा करते हैं।

भला आदमी

एक धनी पुरुष ने एक मन्दिर
बनवाया। मन्दिर में भगवान्
की पूजा करने के लिये एक
पुजारी रखा। मन्दिर के
खर्चके लिये बहुत-सी भूमि, खेत
और बगीचे मन्दिर के नाम
लगाये। उन्होंने ऐसे प्रबन्ध
किया था कि जो मन्दिर में
भूखे, दीन-दुःखी या साधु-संत
आवें, वे वहाँ दो-चार दिन
ठहर सकें और उनको भोजन के
लिये भगवान् का प्रसाद
मन्दिर से मिल जाया करे।
अब उन्हें एक ऐसे मनुष्य
की आवश्यकता हुई जो मन्दिर
की सम्पत्ति का प्रबन्ध करे
और मन्दिर के सब
कामोंको ठीक-ठीक
चलाता रहे।
बहुत-से लोग उस धनी पुरुष के
पास आये। वे लोग जानते थे
कि यदि मन्दिर
की व्यवस्था का काम मिल
जाय तो वेतन अच्छा मिलेगा।
लेकिन उस धनी पुरुषने
सबको लौटा दिया। वह सबसे
कहता था—‘मुझे
भला आदमी चाहिये, मैं
उसको अपने-आप छाँट लूँगा।’
बहुत-से लोग मन-ही-मन उस
धनी पुरुष को गालियाँ देते
थे। बहुत लोग उसे मूर्ख
या पागल बतलाते थे। लेकिन
वह धनी पुरुष किसी की बात
पर ध्यान नहीं देता था। जब
मन्दिर के पट खुलते थे और लोग
भगवान् के दर्शन के लिए आने
लगते थे तब वह धनी पुरुष अपने
मकानकी छत पर बैठकर
मन्दिर में आनेवाले
लोगों को चुपचाप
देखा करता था।
एक दिन एक मनुष्य मन्दिर में
दर्शन करने आया। उसके कपड़े
मैले और फटे हुए थे। वह बहुत
पढ़ा-लिखा भी नहीं जान
पड़ता था। जब वह भगवान्
का दर्शन करके जाने लगा तब
धनी पुरुष ने उसे अपने पास
बुलाया और कहा—‘क्या आप
इस मन्दिर
की व्यवस्था सँभालने का काम
स्वीकार करेंगे ?’
वह मनुष्य बड़े आश्चर्य में पड़
गया। उसने कहा—‘मैं तो बहुत
पढ़ा-लिखा नहीं हूँ। मैं इतने
बड़े मन्दिर का प्रबन्ध कैसे
कर सकूँगा ?’
धनी पुरुषने कहा—मुझे बहुत
विद्वान नहीं चाहिये। मैं
तो एक भले आदमी को मन्दिर
का प्रबन्धक
बनाना चाहता हूँ।’
उस मनुष्य ने कहा—‘आपने इतने
मनुष्यों में मुझे
ही क्यों भला आदमी माना ?’
धनी पुरुष बोला—‘मैं
जानता हूँ कि आप भले
आदमी हैं। मन्दिर के रास्ते में
एक ईंटका टुकड़ा गड़ा रह
गया था और
उसका कोना ऊपर
निकला था। मैं इधर बहुत
दिनों से देखता था कि उस ईंट
के टुकड़े की नोक से
लोगों को ठोकर लगती थी।
लोग गिरते थे, लुढ़कते थे और
उठकर चल देते थे। आपको उस
टुकड़े से ठोकर लगी नहीं; किंतु
आपने उसे देखकर ही उखाड़ देने
का यत्न किया। मैं देख
रहा था कि आप मेरे मजदूर से
फावड़ा माँगकर ले गये और उस
टुकड़े को खोदकर आपने
वहाँ की भूमि भी बराबर कर
दी।’
उस मनुष्य ने कहा—यह
तो कोई बात नहीं है। रास्ते
में पड़े काँटे, कंकड़ और ठोकर
लगने योग्य पत्थर,
ईंटों को हटा देना तो प्रत्येक
मनुष्य का कर्तव्य है।’
धनी पुरुषने कहा—‘अपसे
कर्तव्यको जानने और पालन
करनेवाले लोग ही भले
आदमी होते है।’
वह मनुष्य मन्दिर
का प्रबन्धक बन गया। उसने
मन्दिर का बड़ा सुन्दर
प्रबन्ध किया।

Wednesday, 7 December 2011

राज्य की शोभा

एक राज्य
का राजा बेहद
कठोर और
जिद्दी था। वह
एक बार
जो निर्णय ले
लेता था, उसे
बदलने
को तैयार
नहीं होता था।
एक बार उसने
प्रजा पर
भारी कर
लगाने
की योजना मंत्री
के सामने रखी।
मंत्रियों को यह
प्रस्ताव
अन्यायपूर्ण
लगा। उसने इससे
अपनी असहमति
राजा क्रोधित
हो उठा। उसने
मंत्रिपरिषद
को समाप्त
करने
का फैसला किया
यही नहीं, उसने
सारे
मंत्रियों के देश
निकाले
का आदेश दे
दिया।
मंत्री घबराए।
वे समझ
नहीं पा रहे थे
कि इस
स्थिति का सामना कैसे
किया जाए।
तभी उन्हें
विक्रम नाई
की याद आई।
वह
राजा का प्रिय नाईँ
था। उसने पहले
भी कई
मौकों पर
राजा का क्रोध
शांत किया था।
उसे
बुलाया गया।
मंत्रियों ने उसे
सारी स्थिति उसे बताई
और
प्रार्थना की
ऐसा कुछ करे
जिससे
राजा को सद्बुद्धि प्राप्त हो
विक्रम ने यह
चुनौती स्वीकार
कर ली। वह
राजा के पास
उनके नाखून
काटने गया।
राजा ने
अपनी अंगुलियां
कर दीं।
विक्रम ने
नखों पर गुलाब
जल छिड़का और
धीरे-धीरे नख
काटने लगा।
फिर उसने कहा,
‘महाराज,
शरीर में इन
नखों की आवश्यकता क्या है
वे बढ़ते रहते हैं
और उन्हें बार-
बार
काटना पड़ता
इनमें रोगों के
कीटाणु
भी रहते हैं।
क्यों न इन्हें जड़
से उखाड़ कर फेंक
दिया जाए?’
राजा ने
मुस्कराते हुए
कहा, ‘वो तो है,
लेकिन इन्हें
उखाड़कर मत
फेंक देना। ये
तो हाथ-
पैरों की शोभा
भले
ही इनका
उपयोग न हो,
पर ये आभूषण
तुल्य हैं।’ इस पर
विक्रम ने कहा,
‘महाराज
रोगों का घर
होते हुए भी ये
हाथ-
पैरों की शोभा
ठीक उसी तरह
मंत्रिपरिषद
राज्य
की शोभा है।
मंत्री भले
ही आपके
किसी कार्य
का विरोध करें,
पर
आपकी शोभा
है।’
यह सुनते
ही राजा को अपनी भूल
ज्ञात हुई। विक्रम ने
विनम्रतापूर्व
कहा, ‘राज्य
की सेवा में
उनका महत्वपूर्ण योगदान है।
उनके बगैर
राज्य
बिना नखों के
हाथ की तरह
हो जाएगा।’
राजा समझ
गया। उसने
अपना आदेश
वापस लेकर
मंत्रियों को फिर
से
उनका दायित्व
सौंप दिया।

Tuesday, 6 December 2011

धर्म

मल्लू
और गल्लू सियार
भाई-भाई थे। मल्लू
सीधा-सादा और
भोला था। वह
बड़ा ही नेकदिल और
दयावान था।
दूसरी ओर गल्लू एक
नम्बर का धूर्त और
चालबाज सियार
था। वह
किसी भी भोले-भाले
जानवर
को अपनी चालाकी से
बहलाकर
उसका काम तमाम
कर देता था।
एक दिन गल्लू
सियार जंगल में घूम
रहा था कि उसे
रास्ते में एक चादर
मिली। जाड़े के दिन
नज़दीक थे इसीलिए
उसने चादर
को उठाकर रख
लिया। उसके बाद
वह घर की ओर चल
दिया।
अगले दिन गल्लू
सियार मल्लू के घर
गया। ठण्ड की वजह
से
दरवाजा खोला लेकिन
जैसे ही गल्लू अन्दर
जाने लगा, तो मल्लू
ने दरवाजा बन्द कर
लिया। गल्लू
को अपने भाई की यह
हरकत बहुत
बुरी लगी। उसे अपने
भाई पर बड़ा क्रोध
आया।
भाई के घर से आने के
बाद गल्लू नहाने के
लिए नदी पर गया।
उसको देखकर
बड़ा आश्चर्य
हो रहा था कि आज
सारे मोटे-मोटे
जानवर बड़े बेफिक्र
होकर
बिना किसी डर के
उसके पास से गुजर रहे
थे। उसके पानी में
घुसने से पहले जैसे
ही चादर
को उतारा, उसके
आश्चर्य
का ठिकाना न
रहा। सारे छोटे-
मोटे जानवर अपनी-
अपनी जान बचाने के
लिए इधर-उधर
भागने लगे।
चारों ओर
हाहाकार मच गया।
गल्लू
को लगा कि जरूर इस
चादर का चमत्कार
है। उसके मन में
विचार
आया कि कहीं यह
जादुई तो नहीं।
जिसको ओढ़ते ही वह
अदृश्य
हो जाता हो।
तभी उसे याद
आया कि मल्लू ने
भी दरवाजा खटखटाने
की आवाज सुनकर
दरवाजा खोला और
एकाएक बन्द भी कर
लिया,
मानो दरवाजे पर
कोई हो ही नहीं।
अब उसका शक यकीन
में बदल गया और उसे
मल्लू पर किसी तरह
का क्रोध
भी नहीं रहा। वह
नहाकर जल्दी से
जल्दी अपने भाई
मल्लू सियार के पास
पहुँचना चाहता था।
अत: लम्बे डग
भरता हुआ उसके घर
जा पहुँचा। उसने
मल्लू को वह चादर
दिखाई और प्रसन्न
होते हुए बोला --
"देखो भाई, इस
जादुई चादर
को ओढ़ते ही ओढ़ने
वाला अदृश्य
हो जाता है। मैंने
सोच है कि क्यों न
इसकी मदद से मैं जंगल
के राजा को मारकर
खुद जंगल
का राजा बन जाऊँ।
अगर तुम मेरा साथ
दोगे तो मैं तुम्हें
महामंत्री का पद
दूंगा।
"भाई गल्लू, मुझे
महामंत्री पद
का कोई लालच
नहीं। यदि तुम मुझे
राजा भी बना दोगे
तो भी मैं
नहीं बनूँगा क्योंकि अपने
स्वामी से
गद्दारी में नहीं कर
सकता। मैं तो तुम्हें
भी यही सलाह
दूंगा कि तुम्हें इस
चादर का दुरूपयोग
नहीं करना चाहिए।"
"अपनी सलाह अपने
पास ही रखो। मैं
भी कितना मूर्ख हूँ
जो इस काम में
तुम्हारी सहायता लेने
की सोच बैठा," गुस्से
में भुनभुनाते हुए गल्लू
सियार वहाँ से
चला गया पर मल्लू
सोच में डूब गया।
"अगर गल्लू जंगल
का राजा बन
बैठा तब तो अनर्थ
हो जाएगा। एक
सियार को जंगल
का राजा बना देखकर
पड़ोसी राजा हम
पर आक्रमण कर
देगा।
शक्तिशाली राजा के
अभाव में हम अवश्य
ही हार जायेंगे और
हमारी स्वतंत्रता खतरे
में पड़ जाएगी। यह
सोच कर मल्लू
सियार सिहर
उठा और उसने मन
ही मन गल्लू की चाल
को असफल बनाने
की एक
योजना बना डाली।
रात के समय जब सब
सो रहे थे तब मल्लू
अपने घर से
निकला और चुपचाप
खिड़की के रास्ते
गल्लू के मकान में घुस
गया। उसने
देखा कि गल्लू
की चादर उसके पास
रखी हुई है। उसने
बड़ी ही सावधानी से
उसको उठाया और
उसके स्थान पर
वैसी ही एक अन्य
चादर रख
दी जो कि बिल्कुल
वैसी थी। इसके बाद
वह अपने घर आ गया।
सुबह उठकर नहा-
धो कर गल्लू सियार
शेर को मारने के लिए
चादर ओढ़कर
प्रसन्नतापूर्वक
उसकी माँद की ओर
चल पड़ा। आज उसके
पाँव धरती पर
नहीं पड़ रहे थे।
आखिर वह अपने
को भावी राजा समझ
रहा था। माँद में
पहुँचकर उसने
देखा कि शेर
अभी सो रहा था।
गल्लू ने गर्व से
उसको एक लात
मारी और
उसको जगा कर
गालियाँ देने लगा।
शेर चौंक कर उठ
गया। वह
भूखा तो था ही,
उपर से गल्लू ने
उसको क्रोध
भी दिलाया था,
सो उसने एक ही बार
में गल्लू का काम
तमाम कर दिया।
मल्लू सियार को जब
अपने भाई की यह
खबर
मिली तो उसको बड़ा दुख
हुआ पर उसने
सोचा कि इसके
अलावा जंगल
की स्वतंत्रता को बचाने
का कोई
रास्ता भी तो नहीं था।
उसकी आँखों में आँसू आ
गए, वह उठा और
उसने उस जादुई
चादर
को जला डाला ताकि वह
किसी और के हाथ में
न पड़ जाए।
मल्लू ने अपने भाई
की जान देकर अपने
राजा के प्राण
बचाए थे और जंगल
की स्वतंत्रता भी।

गरम जामुन

बहुत
समय
पहले की बात है,
सुंदरवन में श्वेतू
नामक एक
बूढ़ा खरगोश
रहता था। वह
इतनी अच्छी कविता लिखता था कि सारे
जंगल के
पशु्पक्षी उन्हें
सुनकर दातों तले
उँगली दबा लेते और
विद्वान तोता तक
उनका लोहा मानता था।
श्वेतू खरगोश ने
शास्त्रार्थ में
सुरीली कोयल और
विद्वान मैना तक
को हरा कर विजय
प्राप्त की थी।
इसी कारण जंगल
का राजा शेर
भी उसका आदर
करता था। पूरे
दरबार में उस
जैसा विद्वान कोई
दूसरा न था। धीरे-
धीरे उसे
अपनी विद्वत्ता का बड़ा घमण्ड
हो गया।
एक दिन वह बड़े सवेरे
खाने की तलाश में
निकला। बरसात के
दिन थे, काले
बादलों ने
घिरना शुरू
ही किया था।
मौसम
की पहली बरसात
होने ही वाली थी।
सड़क के किनारे
जामुनों के पेड़ काले-
काले जामुनों से भरे
झुके हुए थे। बड़े-बड़े,
काले, रसीले
जामुनों को देखकर
श्वेतू के मुँह में
पानी भर आया।
एक बड़े से जामुन के
पेड़ के नीचे जाकर
उसने आँखें उठाई और
ऊपर देखा तो नन्हें
तोतों का एक झुण्ड
जामुन
खाता दिखाई
दिया। बूढ़े खरगोश
ने नीचे से आवाज़ दी,
"प्यारे नातियों मेरे
लिये भी थोड़े से
जामुन गिरा दो।"
उन नन्हें तोतों मे
मिठ्ठू नाम का एक
तोता बड़ा शरारती और
चंचल था। वह ऊपर से
ही बोला,
'दादा जी, यह
तो बताइये कि आम
गरम जामुन खायेंगे
या ठंडी?"
बेचारा बूढ़ा श्वेतू
खरगोश हैरान
होकर बोला,
"भला जामुन
भी कहीं गरम होते
हैं? चलो मुझसे मज़ाक
न करो। मुझे थोड़े से
जामुन तोड़ दो।"
मिठ्ठू बोला, "अरे
दादाजी, आप ठहरे
इतने बड़े विद्वान।
यह भी नहीं जानते
कि जामुन गरम
भी होते हैं और ठंडे
भी। पहले आप
बताइये
कि आपको कैसे जामुन
चाहिये? भला इसे
जाने बिना मैं
आपको कैसे जामुन
दूँगा?"
बूढ़े और विद्वान
खरगोश की समझ में
बिलकुल भी न
आया कि जामुन गरम
भला कैसे होंगे? फिर
भी वह उस रहस्य
को जानना चाहता था इसलिये
बोला, "बेटा, तुम मुझे
गरम जामुन
ही खिलाओ ठंडे
तो मैंने बहुत खाए
हैं।"
नन्हें मिठ्ठू ने बूढ़े
श्वेतू की यह बात
सुनकर जामुन की एक
डाली को ज़ोर से
हिलाया। पके-पके
ढेर से जामुन नीचे धूल
में बिछ गये।
बूढ़ा श्वेतू उन्हें
उठाकर धूल फूँक-फूँक
कर खाने लगा। यह
देखकर नन्हें मिठ्ठू ने
पूछा,
"क्यों दादाजी,
जामुन खूब गरम हैं
न?"
"कहाँ बेटा? मैं
तो साधारण ठंडे
जामुन ही हैं।"
खरगोश बोला। नन्हें
मिठ्ठू तोते ने चौंक
कर पूछा,
"क्या कहा ठंडे हैं?
तो फिर आप इन्हें
फूँक-फूँक कर
क्यों खा रहे हैं? इस
तरह तो सिर्फ गरम
चीजें ही खाई
जाती है।"
नन्हें मिठ्ठू तोते
की बात का रहस्य
अब जाकर बूढ़े
खरगोश की समझ में
आया और वह
बड़ा शर्मिन्दा हुआ।
इतना विद्वान
बूढ़ा श्वेतू खरगोश
जरा सी बात में छोटे
से तोते के बच्चे से
हार गया था।
उसका घमण्ड दूर
हो गया और उसने एक
कविता लिखी -
खूब कड़ा तना शीशम
का, बड़े कुल्हाड़े से
कट जाता।
लेकिन
वो ही बड़ा कुल्हाड़ा,
कोमल केले से घिस
जाता।
सच है कभी-
कभी छोटे भी,
ऐसी बड़ी बात कहते
हैं।
बहुत बड़े विद्वान
गुणी भी, अपना सिर
धुनने लगते हैं।