Saturday, 31 December 2011

मैकू(मुंशी प्रेमचन्द)

कादिर और मैकू
ताड़ीखाने के
सामने पहूँचे;
तो वहॉँ कॉँग्रेस के
वालंटियर
झंडा लिए खड़े नजर
आये। दरवाजे के
इधर-उधर
हजारों दर्शक खड़े
थे। शाम का वक्त
था। इस वक्त
गली में
पियक्कड़ों के
सिवा और कोई न
आता था। भले
आदमी इधर से
निकलते झिझकते।
पियक्कड़ों की
छोटी-
छोटी टोलियॉँ
आती-
जाती रहती थीं।
दो-चार वेश्याऍं
दूकान के सामने
खड़ी नजर
आती थीं। आज यह
भीड़-भाड़ देख कर
मैकू ने कहा—
बड़ी भीड़ है बे,
कोई दो-तीन
सौ आदमी होंगे।
कादिर ने
मुस्करा कर
कहा—भीड़ देख
कर डर गये क्या?
यह सब हुर्र
हो जायँगे, एक
भी न टिकेगा। यह
लोग तमाशा देखने
आये हैं,
लाठियॉँ खाने
नहीं आये हैं।
मैकू ने संदेह के स्वर
में कहा—पुलिस के
सिपाही भी बैठे
हैं। ठीकेदार ने
तो कहा थ, पुलिस
न बोलेगी।
कादिर—हॉँ बे ,
पुलिस न बोलेगी,
तेरी नानी क्यों
मरी जा रही है ।
पुलिस
वहॉँ बोलती है,
जहॉँ चार पैसे
मिलते है
या जहॉँ कोई औरत
का मामला होता
है। ऐसी बेफजूल
बातों में पुलिस
नहीं पड़ती।
पुलिस तो और शह
दे रही है।
ठीकेदार से साल में
सैकड़ों रुपये मिलते
हैं। पुलिस इस वक्त
उसकी मदद न
करेगी तो कब
करेगी?
मैकू—चलो, आज दस
हमारे भी सीधे
हुए। मुफ्त में पियेंगे
वह अलग, मगर हम
सुनते हैं,
कॉँग्रेसवालों में
बड़े-बड़े मालदार
लोग शरीक है। वह
कहीं हम लोगों से
कसर निकालें
तो बुरा होगा।
कादिर—अबे,
कोई कसर-वसर
नहीं निकालेगा,
तेरी जान
क्यों निकल
रही है?
कॉँग्रेसवाले
किसी पर हाथ
नहीं उठाते, चाहे
कोई उन्हें मार
ही डाले।
नहीं तो उस दिन
जुलूस में दस-बारह
चौकीदारों की
मजाल थी कि दस
हजार
आदमियों को पीट
कर रख देते। चार
तो वही ठंडे
हो गये थे, मगर एक
ने हाथ
नहीं उठाया।
इनके
जो महात्मा हैं,
वह बड़े
भारी फकीर है !
उनका हुक्म है
कि चुपके से मार
खा लो, लड़ाई मत
करो।
यों बातें करते-
करते
दोनों ताड़ीखाने
के द्वार पर पहुँच
गये। एक स्वयंसेवक
हाथ जोड़कर
सामने आ गया और
बोला –भाई
साहब, आपके मजहब
में ताड़ी हराम है।
मैकू ने बात
का जवाब चॉँटे से
दिया ।
ऐसा तमाचा
मारा कि
स्वयंसेवक
की ऑंखों में खून आ
गया। ऐसा मालूम
होता था,
गिरा चाहता है।
दूसरे स्वयंसेवक ने
दौड़कर उसे
सँभाला।
पॉँचों उँगलियो
का रक्तमय
प्रतिबिम्ब झलक
रहा था।
मगर वालंटियर
तमाचा खा कर
भी अपने स्थान पर
खड़ा रहा। मैकू ने
कहा—अब
हटता है कि और
लेगा?
स्वयंसेवक ने
नम्रता से कहा—
अगर
आपकी यही इच्छा
है, तो सिर सामने
किये हुए हूँ।
जितना चाहिए,
मार लीजिए।
मगर अंदर न
जाइए।
यह कहता हुआ वह
मैकू के सामने बैठ
गया ।
मैकू ने स्वयंसेवक के
चेहरे पर निगाह
डाली।
उसकी पॉचों
उँगलियों के
निशान झलक रहे
थे। मैकू ने इसके पहले
अपनी लाठी से टूटे
हुए कितने ही सिर
देखे थे, पर आज की-
सी ग्लानी उसे
कभी न हुई थी। वह
पाँचों उँगलियों के
निशान
किसी पंचशूल
की भॉति उसके
ह्रदय में चुभ रहे थे।
कादिर
चौकीदारों के
पास खड़ा सिगरेट
पीने लगा।
वहीं खड़े-खड़े
बोला—अब,
खड़ा क्या देखता है
, लगा कसके एक
हाथ।
मैकू ने स्वयंसेवक से
कहा—तुम उठ
जाओ, मुझे अन्दर
जाने दो।
‘आप
मेरी छाती पर
पॉँव रख कर चले
जा सकते हैं।’
‘मैं कहता हूँ, उठ
जाओ, मै अन्दर
ताड़ी न पीउँगा ,
एक दूसरा ही काम
है।’
उसने यह बात कुछ
इस दृढ़ता से
कही कि स्वयंसेवक
उठकर रास्ते से हट
गया। मैकू ने
मुस्करा कर
उसकी ओर ताका ।
स्वयंसेवक ने फिर
हाथ जोड़कर
कहा—
अपना वादा भूल न
जाना।
एक चौकीदार
बोला—लात के
आगे भूत भागता है,
एक ही तमाचे में
ठीक हो गया !
कादिर ने कहा—
यह
तमाचा बच्चा को
जन्म-भर याद
रहेगा। मैकू के
तमाचे सह
लेना मामूली काम
नहीं है।
चौकीदार—आज
ऐसा ठोंको इन
सबों को कि फिर
इधर आने को नाम
न लें ।
कादिर—खुदा ने
चाहा, तो फिर
इधर आयेंगे
भी नहीं। मगर हैं
सब बड़े हिम्मती।
जान को हथेली पर
लिए फिरते हैं।
2
मैकू भीतर पहुँचा,
तो ठीकेदार ने
स्वागत किया –
आओ मैकू मियॉँ ! एक
ही तमाचा लगा
कर क्यो रह गये?
एक तमाचे
का भला इन पर
क्या असर होगा?
बड़े लतखोर हैं सब।
कितना ही पीटो,
असर
ही नहीं होता।
बस आज सबों के
हाथ-पॉँव तोड़
दो; फिर इधर न
आयें ।
मैकू—तो क्या और
न आयेंगें?
ठीकेदार—फिर
आते सबों की नानी
मरेगी।
मैकू—और
जो कहीं इन
तमाशा देखनेवालों
ने मेरे ऊपर डंडे
चलाये तो!
ठीकेदार—
तो पुलिस
उनको मार
भगायेगी। एक
झड़प में मैदान साफ
हो जाएगा। लो,
जब तक एकाध
बोतल पी लो। मैं
तो आज मुफ्त
की पिला रहा हूँ।
मैकू—क्या इन
ग्राहकों को भी
मुफ्त ?
ठीकेदार –
क्या करता , कोई
आता ही न था।
सुना कि मुफ्त
मिलेगी तो सब धँस
पड़े।
मैकू—मैं तो आज न
पीऊँगा।
ठीकेदार—क्यों?
तुम्हारे लिए
तो आज
ताजी ताड़ी
मँगवायी है।
मैकू—यों ही , आज
पीने
की इच्छा नहीं है।
लाओ, कोई
लकड़ी निकालो,
हाथ से मारते
नहीं बनता ।
ठीकेदार ने लपक
कर एक
मोटा सोंटा मैकू के
हाथ में दे दिया,
और डंडेबाजी का
तमाशा देखने के
लिए द्वार पर
खड़ा हो गया ।
मैकू ने एक क्षण डंडे
को तौला, तब
उछलकर ठीकेदार
को ऐसा डंडा
रसीद
किया कि वहीं
दोहरा होकर
द्वार में गिर
पड़ा। इसके बाद
मैकू ने
पियक्कड़ों की ओर
रुख किया और
लगा डंडों की
वर्षा करने। न आगे
देखता था, न पीछे,
बस डंडे चलाये
जाता था।
ताड़ीबाजों के नशे
हिरन हुए ।
घबड़ा-घबड़ा कर
भागने लगे, पर
किवाड़ों के बीच में
ठीकेदार की देह
बिंधी पड़ी थी।
उधर से फिर भीतर
की ओर लपके। मैकू ने
फिर डंडों से
आवाहन किया ।
आखिर सब
ठीकेदार की देह
को रौद-रौद कर
भागे।
किसी का हाथ
टूटा,
किसी का सिर
फूटा,
किसी की कमर
टूटी। ऐसी भगदड़
मची कि एक मिनट
के अन्दर
ताड़ीखाने में एक
चिड़िये का पूत
भी न रह गया।
एकाएक मटकों के
टूटने की आवाज
आयी। स्वयंसेवक ने
भीतर झाँक कर
देखा, तो मैकू
मटकों को विध्वंस
करने में जुटा हुआ
था। बोला—भाई
साहब, अजी भाई
साहब, यह आप
गजब कर रहे हैं।
इससे
तो कहीं अच्छा कि
आपने हमारे
ही ऊपर
अपना गुस्सा
उतारा होता।
मैंकू ने दो-तीन
हाथ चलाकर
बाकी बची हुई
बोतलों और
मटकों का सफाया
कर दिया और तब
चलते-चलते
ठीकेदार को एक
लात जमा कर
बाहर निकल
आया।
कादिर ने
उसको रोक कर
पूछा –तू पागल
तो नहीं हो गया है
बे?
क्या करने
आया था, और
क्या कर रहा है।
मैकू ने लाल-लाल
ऑंखों से उसकी ओर
देख कर कह—
हॉँ अल्लाह
का शुक्र है कि मैं
जो करने आया था,
वह न करके कुछ और
ही कर बैठा। तुममें
कूवत हो,
तो वालंटरों को
मारो, मुझमें कूवत
नहीं है। मैंने
तो जो एक थप्पड़
लगाया।
उसका रंज अभी तक
है और
हमेशा रहेगा !
तमाचे के निशान
मेरे कलेजे पर बन
गये हैं। जो लोग
दूसरों को गुनाह से
बचाने के लिए
अपनी जान देने
को खड़े हैं, उन पर
वही हाथ
उठायेगा,
जो पाजी है,
कमीना है, नामर्द
है। मैकू फिसादी है,
लठैत ,गुंडा है, पर
कमीना और
नामर्द नहीं हैं।
कह
दो पुलिसवालों से ,
चाहें तो मुझे
गिरफ्तार कर लें।
कई ताड़ीबाज खड़े
सिर सहलाते हुए,
उसकी ओर
सहमी हुई ऑंखो से
ताक रहै थे। कुछ
बोलने की हिम्मत
न पड़ती थी। मैकू ने
उनकी ओर देख कर
कहा –मैं कल फिर
आऊँगा। अगर तुममें
से किसी को यहॉँ
देखा तो खून
ही पी जाऊँगा !
जेल और फॉँसी से
नहीं डरता।
तुम्हारी भलमनसी
इसी में है कि अब
भूल कर भी इधर न
आना । यह
कॉँग्रेसवाले
तुम्हारे दुश्मन
नहीं है। तुम्हारे
और तुम्हारे बाल-
बच्चों की भलाई के
लिए ही तुम्हें पीने
से रोकते हैं। इन
पैसों से अपने बाल-
बच्चो की
परवरिश करो,
घी-दूध खाओ। घर
में तो फाके हो रहै
हैं,
घरवाली तुम्हारे
नाम
को रो रही है, और
तुम यहॉँ बैठे
पी रहै हो? लानत
है इस नशेबाजी पर
।
मैकू ने
वहीं डंडा फेंक
दिया और कदम
बढ़ाता हुआ घर
चला। इस वक्त तक
हजारों आदमियों
का हुजूम
हो गया था।
सभी श्रद्धा, प्रेम
और गर्व
की ऑंखो से मैकू
को देख रहे थे।

Wednesday, 28 December 2011

पुत्रवधू की अक्लमंदी

एक किसान था। इस
बार फसल कम होने
की वजह से चिंतित था।
घर में राशन ग्यारह
महीने चल सके
उतना ही था।
बाकी एक महीने
का राशन कैसे लायेगा,
कहाँ से इसका इंतजाम
होगा यह चिंता उसे
बार-बार
सता रही थी।
किसान की पुत्रवधू ने
यह ध्यान
दिया कि पिताजी कि
सी बात को लेकर
परेशान है। पुत्रवधू ने
किसान से पूछा कि -
"क्या बात है,
पिताजी ? आप
इतना परेशान
क्यों है ?"
तब किसान ने
अपनी चिंता का कारण
पुत्रवधू
को बताया कि - "इस
साल फसल कम होने
कि वजह से ग्यारह
महीने चल सके
उतना ही राशन है।
बाकी एक महिना कैसे
गुजरेगा यही सोच
रहा है ?"
किसान की यह बात
सुनकर पुत्रवधू ने
थोडा सोचकर कहा -
"पिताजी, आप
चिंता ना करे, बेफिक्र
हो जाए,
उसका इंतजाम
हो जायेगा।"
ग्यारह महीने बीत
गए, अब
बारहवा महिना भी आ
राम से पसार हो गया।
किसान सोच में पड़
गया कि - "घर में अनाज
तो ग्यारह महीने चले
उतना ही था, तो ये
बारहवा महिना आराम
से कैसे गुजरा ?"
किसान ने
अपनी पुत्रवधू
को बुलवाकर पूछा -
"बेटी, ग्यारह महीने
का राशन बारहवे
महीने तक कैसे चला ?
यह चमत्कार कैसे हुआ ?"
तब पुत्रवधू ने जवाब
दिया कि - "पिताजी,
राशन तो ग्यारह
महीने चले
उतना ही था। किन्तु,
जिस दिन आपने
अपनी चिंता का कारण
बताया... उसी दिन से
रसोई के लिए
जो भी अनाज
निकालती उसी में से
एक-दो मुट्ठी हररोज
वापस कोठी में दाल
देती। बस उसी की वजह
से यह बारहवे महीने
का इंतजाम हो गया।
और बिना तकलिफ़ के
बारहवा महिना आराम
से गुजर गया।"
किसान ने यह बात
सुनी तो दंग सा रह
गया । और
अपनी पुत्रवधू की बचत
समझदारी की अकलमंदी
पर गर्व करने लगा।

Tuesday, 20 December 2011

साहस

एक
बकरी थी।
एक उसका मेमना।
दोनों जंगल में चर रहे
थे। चरते - चरते
बकरी को प्यास
लगी। मेमने
को भी प्यास लगी।
बकरी बोली - 'चलो,
पानी पी आएँ।' मेमने
ने भी जोड़ा, 'हाँ माँ!
चलो पानी पी आएँ।'
पानी पीने के लिए
बकरी नदी की ओर
चल दी।
मेमना भी पानी पीने
के लिए नदी की ओर
चल पड़ा।
दोनों चले। बोलते-
बतियाते। हँसते-
गाते। टब्बक-टब्बक।
टब्बक-टब्बक।
बातों-बातों में
बकरी ने मेमने
को बताया - 'साहस
से काम लो तो संकट
टल जाता है। धैर्य
यदि बना रहे
तो विपत्ति से
बचाव
का रास्ता निकल
ही आता है।
माँ की सीख मेमने ने
गाँठ बाँध ली।
दोनों नदी तट पर
पहुँचे। वहाँ पहुँचकर
बकरी ने
नदी को प्रणाम
किया। मेमने ने
भी नदी को प्रणाम
किया। नदी ने
दोनों का स्वागत
कर उन्हें सूचना दी,
'भेड़िया आने
ही वाला है।
पानी पीकर फौरन
घर की राह लो।'
'भेड़िया गंदा है। वह
मुझ जैसे छोटे
जीवों पर रौब
झाड़ता है। उन्हें
मारकर
खा जाता है। वह
घमंडी भी है। तुम उसे
अपने पास क्यों आने
देती हो।
पानी पीने से
मना क्यों नही कर
देती।' मेमने ने नदी से
कहा।
नदी मुस्कुराई।
बोली- 'मैं जानती हूँ
कि भेड़िया गंदा है।
अपने से छोटे
जीवों को सताने
की उसकी आदत मुझे
जरा भी पसंद
नहीं है। पर
क्या करूँ। वह जब
भी मेरे पास आता है,
प्यासा होता है।
प्यास
बुझाना मेरा धर्म
हैं। मैं उसे
मना नहीं कर
सकती।'
बकरी को बहुत जोर
की प्यास लगी थी।
मेमने को भी बहुत
जोर की प्यास
लगी थी।
दोनों नदी पर झुके।
नदी का पानी शीतल
था। साथ में
मीठा भी। बकरी ने
खूब पानी पिया।
मेमने ने भी खूब
पानी पिया।
पानी पीकर
बकरी ने डकार ली।
पानी पीकर मेमने
को भी डकार आई।
डकार से पेट
हल्का हुआ
तो दोनों फिर
नदी पर झुक गए।
पानी पीने लगे।
नदी उनसे कुछ
कहना चाहती थी।
मगर
दोनों को पानी पीते
देख चुप रही।
बकरी ने उठकर
पानी पिया। मेमने
ने भी उठकर
पानी पिया।
पानी पीकर
बकरी मुड़ी तो उसे
जोर
का झटका लगा।
लाल आँखों,
राक्षसी डील-डौल
वाला भेड़िया सामने
खड़ा था। उसके
शरीर का रक्त जम-
सा गया।
मेमना भी भेड़िये
को देख घबराया।
थोड़ी देर तक
दोनों को कुछ न
सूझा।
'अरे वाह! आज तो ठंडे
जल के साथ
गरमागरम भोजन
भी है। अच्छा हुआ
जो तुम
दोनों यहाँ मिल
गए। बड़ी जोर
की भूख लगी है। अब मैं
तुम्हें खाकर पहले
अपनी भूख
मिटाऊँगा।
पानी बाद में
पिऊँगा।
तब तक बकरी संभल
चुकी थी।
मेमना भी संभल
चुका था।
'छि; छि; कितने गंदे
हो तुम। मुँह पर
मक्खियाँ भिनभिना रही है।
लगता है महीनों से
मुँह नहीं धोया।
मेमना बोला।
भेड़िया सकपकाया।
बगले झाँकने लगा।
'जाने दे बेटा। ये ठहरे
जंगल के मंत्री।
बड़ों की बड़ी बातें।
हम उन्हें कैसे समझ
सकते हैं। हो सकता है
भेड़िया दादा ने मुँह
न धोने के लिए कसम
उठा रखी हो।'
बकरी ने बात
बढ़ाई।
'क्या बकती है।
थोड़ी देर पहले
ही तो रेत में रगड़कर
मुँह साफ किया है।'
भेड़िया गुर्राया।
'झूठे कहीं के। मुँह
धोया होता तो क्या ऐसे
ही दिखते। तनिक
नदी में झाँक कर
देखो। असलियत
मालूम पड़ जाएगी।'
हिम्मत बटोर कर
मेमने ने कहा।
भेड़िया सोचने लगा।
बकरी बड़ी है।
उसका भरोसा नहीं।
यह
नन्हाँ मेमना भला क्या झूठ
बोलेगा। रेत से
रगड़ा था,
हो भी सकता है
वहीं पर
गंदी मिट्टी से मुँह
सन गया हो । ऐसे में
इन्हें
खाऊँगा तो नाहक
गंदगी पेट में
जाएगी। फिर
नदी तक जाकर उसमें
झाँककर देखने में
भी कोई
हर्जा नहीं है।
ऐसा संभव नहीं कि मैं
पानी में झाँकू और ये
दोनों भाग जाएँ।
"ऊँह, भागकर जाएँगे
भी कहाँ। एक झपट्टे
में पकड़ लूँगा।
'देखो! मैं मुँह धोने
जा रहा हूँ। भागने
की कोशिश मत
करना।
वरना बुरी मौत
मारूँगा।' भेड़िया ने
धमकी दी।
बकरी हाथ जोड़कर
कहने लगी,
'हमारा तो जन्म
ही आप जैसों की भूख
मिटाने के लिए हुआ
है। हमारा शरीर
जंगल के मंत्री की भूख
मिटानै के काम आए
हमारे लिए इससे
ज्यादा बड़ी बात
भला और
क्या हो सकती है।
आप तसल्ली से मुँह
धो लें। यहाँ से बीस
कदम आगे
नदी का पानी बिल्कुल
साफ है। वहाँ जाकर
मुँह धोएँ। विश्वास
न हो तो मैं भी साथ
में चलती हूँ।'
भेड़िये को बात
भा गई। वह उस ओर
बढ़ा जिधर बकरी ने
इशारा किया था।
वहाँ पर
पानी काफी गहरा था।
किनारे चिकने। जैसे
ही भेड़िये ने
अपना चेहरा देखने के
लिए नदी में झाँका,
पीछे से बकरी ने
अपनी पूरी ताकत
समेटकर जोर
का धक्का दिया।
भेड़िया अपने
भारी भरकम शरीर
को संभाल न
पाया और 'धप' से
नदी में जा गिरा।
उसके गिरते
ही बकरी ने वापस
जंगल की दिशा में
दौड़ना शुरू कर
दिया। उसके पीछे
मेमना भी था।
दोनों नदी से
काफी दूर निकल
आए। सुरक्षित स्थान
पर पहुँचकर
बकरी रुकी।
मेमना भी रुका।
बकरी ने लाड़ से मेमने
को देखा। मेमने ने
विजेता के से दर्प
साथ
अपनी माँ की आँखों में
झाँका। दोनों के
चेहरों से
आत्मविश्वास झलक
रहा था।
बकरी बोली --
‘कुछ समझे?'
'हाँ समझा।'
'क्या ?
'साहस से काम
लो तो खतरा टल
जाता है।'
'और?'
'धैर्य यदि बना रहे
तो विपत्ति से बचने
का रास्ता निकल
ही आता है।'
'शाबाश!'
बकरी बोली।
इसी के साथ वह हँसने
लगी। माँ के साथ-
साथ मेमना भी हँसने
लगा।

Sunday, 18 December 2011

राजकुमार का अदम्य साहस-8

जब जहाज किनारे
आकर
लगा तो राजकुमार ने
देखा कि वजीर
का लड़का वहां उपस्थ
था। राजकुमार ने
पद्मिनी से
उसका परिचय कराते
हुए कहा, “यह
मेरा साथी है। सागर
की यात्रा आरंभ करने
तक मेरे दु:ख-सुख में
इसने बराबर
मेरा साथ दिया।”
वजीर
का लड़का पद्मिनी क
गदगद् हो गया। उस
दिन वहीं रहने के
लिए उसने एक भवन
की व्यवस्था कर
रक्खी थी।
वहां पहुंचने पर
राजकुमार
को मैना की बात
याद आ गई।
राजकुमार ने कहा,
“हमें
यहां नहीं ठहराना।
और कोई भवन देखो।”
वजीर के लड़के ने
कहा, “आपके आने से
पहले मैं यहां के सारे
भवन देख चुका हूं। यह
सबसे अच्छा है।” पर
राजकुमार ने
उसकी एक न सुनी।
वजीर के लड़के ने दूसरे
भवन की खोज की।
दूसरा भवन उस भवन
के पास ही मिल
गया। वे लोग उसमें
ठहर गये। बड़ी देर
तक राजकुमार उसे
अपनी कहानी सुनात
फिर वे सो गये।
आधी रात के बाद
जोर की गड़गड़ाहट
हुई। वजीर
का लड़का उठकर
बाहर आया तो देखा,
पहला भवन गिरकर
मिट्टी में मिल
गया है। उसने
राजकुमार
की दूरंदेशी की भूरी-
भूरी प्रशंसा की।
पद्मिनी तो सो गई,
लेकिन राजकुमार
रात-भर तारे
गिनता रहा। भोर
होने से पहले
देखता क्या है कि एक
काला विषैला सांप
आया और
कुण्डली मारकर
पद्मिनी के जूते में बैठ
गया। राजकुमार
तो चिंतित होकर उस
घड़ी की प्रतीक्षा क
जूते में बैठे सांप
को मारा ही रहा थ
उसने तलवार निकाल
कर सांप के दो टुकड़े
कर डाले और बाहर
फैंक कर पद्मिनी के
उठने की राह देखने
लगा। थोड़ी देर में
पद्मिनी उठी।
उसकी थकान दूर
हो गई थी और उसके
चेहरे की कांति लौट
आई थी। उसने
मुस्करा कर
राजकुमार की ओर
देखा। राजकुमार
भी मुस्कराकर उसे
पास गया और कुछ देर
तक उसके मुलायम
बालों को सहलाता र
पद्मिनी मन ही मन
विभोर
हो रही थी कि उसे
अपने जीवन साथी के
रूप में एक ऐसा सुन्दर
और
पराक्रमी व्यक्ति म
गया।
वजीर के लड़के ने आगे
की यात्रा उड़नखटो
से करने का विचार
किया और एक
उड़नखटोला मंगवा भ
लेकिन राजकुमार ने
उसमें बैठने से साफ
इनकार कर दिया।
वजीर के लड़के
को बड़ा बुरा लगा,
पर राजकुमार के आगे
उसकी एक न चली। वे
घोड़ों पर सवार
होकर ही आगे बढ़े।
उड़नखटोले में कुछ और
लोग बैठ गये, लेकिन
थोड़ी दूर जाकर
उड़नखटोला धड़ाम से
नीचे आ गिरा और
उसमें बैठे सब
लोगों की जाने
चली गईं। राजकुमार
ने अनुभव
किया कि मैना की भ
थी।
मार्ग में मनमोहक
दूश्यों को देखते हुए वे
लोग आगे बढ़ते गये।
अपने द्वीप से
पद्मिनी कभी बाहर
नहीं गई थी। अब
लम्बी-
चौड़ी दुनिया उसके
सामने थी। तरह तरह
के लोग थे, तरह-तरह
की उनकी पोशाकें
थीं, तरह-तरह के
उनके आचार-विचार
थे। राजकुमार ने
कहा, “पद्मिनी, अब
हम एक ऐसे बाबा के
आश्रम में चल रहे हैं,
जिनके हृदय में प्रेम
का दरिया बहता है।
जो भी उनके पास
जाता है, उसका मन
जीत लेते हैं। जिन
खड़ाऊ को पहनकर मैंने
सागर पार
किया था, वे उन्होंने
ही दिये थे।”
पद्मिनी आश्चर्य कर
रही थी कि आखिर
राजकुमार ने उस
विशाल सागर को कैसे
पार किया! अब
उसका भेद खुल गया।
पद्मिनी ने कहा,
“राजकुमार, संत लोग
मोह-माया से परे
होते हैं, लेकिन कोई-
कोई संत ऐसे भी होते
हैं, जो लोगों के दु:ख-
दर्द को अपने ऊपर ले
लेते हैं।” कहते-कहते
पद्मिनी के भीतर जैसे
करुणा का स्रोत फूट
पड़ा। उसने
उसकी वाणी को अवरू
कर दिया।
बाबा का आश्रम अब
कुछ दूरी पर था।
राजकुमार ने कहा,
“हमें देर भले
ही हो जाये, पर हम
रुकेंगे बाबा के आश्रम
में ही।”
रास्ता काटने के लिए
राजकुमार
पद्मिनी को अच्छे-
अच्छे किस्से
सुनाता रहा। वह
उन्हें ध्यान से
सुनती रही।
अंत में आसमान जब
टिमटिमाते तारों से
जगमगा उठा, वे
आश्रम में पहुंच गये।
बाबा कई दिन से
उनकी राह देख रहे
थे। इतनी देर कैसे
हो गई, यह सोचकर
उनका मन व्याकुल
हो उठता था।
राजकुमार
को पद्मिनी के साथ
सामने देखकर
उनका हृदय हर्ष से
पुलकित हो उठा।
उन्होंने बड़ी ममता से
उनका स्वागत
किया और आश्रम के
सर्वोत्कृष्ट कक्ष में
उन्हें ठहराया। उस
कक्ष में कोई दीवार
नहीं थी। हरी-
भरी वल्लरियों ने
एक-दूसरे से लिपट कर
उस कक्ष का निर्माण
किया था।
पद्मिनी उस कक्ष
को देखकर रोमांचित
हो उठी। बाबा ने
बड़े प्यार से कहा,
“तुम लोग बड़ा सफर
करके आये हो। थक गये
होंगे। कुछ खा-
पी लो और आराम से
सो जाओ।” रात
बढ़ती जा रही थी,
अंधकार
गाढ़ा हो रहा था,
पर उस घने अंधेरे में
भी आश्रम
की आत्मा अपनी माधु
रही थी। आश्रम के
अंतेवासियों ने अपने
शाही मेहमानों के
लिए नाना प्रकार के
व्यंजन तैयार कर दिये
थे। बड़े उल्लास के
वातावरण में
मेहमानों ने आश्रम
का प्रसाद पाया।
प्रत्येक वस्तु
इतनी स्वादिष्ट
थी कि राजकुमार और
पद्मिनी ने अनुभव
किया, मानों वह
किसी देवलोक में आये
हों। बाबा बराबर
उनके नीचे रहे और
उन्हें पुलकित देखकर
स्वयं आनंद विभोर
होते रहे। पद्मिनी ने
कहा, “मैं तो सोच
भी नहीं सकती थी क
में इस प्रकार मंगल
होगा। पर
संतों की महिमा को
जानता है।” यह
सुनकर बाबा से चुप
नहीं रहा गया।
बोले, “पद्मिनी,
आनंद भीतर की चीज़
है। जब
आदमी का अंतर
प्रमुदित होता है
तो बाहर सब कुछ
हरा-भरा दिखाई
देता है।” पद्मिनी ने
सिर हिला कर
बाबा के कथन
को स्वीकृति दी।
प्रसाद ग्रहण करने के
बाद सब सो गये।
बाबा ब्रह्म मुहूर्त में
उठ गये। उन्होंने
आश्रम का एक चक्कर
लगाया, गोशाला में
जाकर
गायों को प्यार
किया। तबतक
राजकुमार और
पद्मिनी उठकर
वहां आ गये। बाबा ने
हंसकर कहा,
“पद्मिनी, तुम इस
आश्रम में एक
भी बूढ़ा पेड़
नहीं पाओगी, और
देखो जब हम
गायों को पुचकारते
हैं, उनकी पीठ पर
हाथ फिरते हैं
तो उनके थनों से दूध
की धारा बहने
लगती है। पेड़-पौधे
और पशु-
पक्षी भी प्यार के
भूखे होते हैं।”
पद्मिनी ने आश्रम में
निगाह
डाली तो सचमुच उसे
एक भी बूढ़ा पेड़
दिखाई
नहीं दिया और
बाबा ने जब
गायों को दुधाया और
उनकी पीठ पर हाथ
फिराया तो उनके
थनों से दूध
की धाराएं बहने
लगीं।
पद्मिनी चकित रह
गई। ऐसा दृश्य उसने
पहले
कभी नहीं देखा था।
आश्रम में मेहमान एक
दिन रहना चाहते थे।
बाबा के प्रेम ने उन्हें
चार दिन रोक
लिया। वहां के
वातावरण में
पद्मिनी का मन
इतना रम
गया कि जब
विदा होने का समय
आया तो वह रोने
लगी। बाबा का दिल
भी भर आया। उन्होंने
कहा, “पद्मिनी,
आश्रम तुम्हारा है।
जब जी में आये, फिर आ
जाना।” राजकुमार
ने बाबा को खड़ाऊं
लौटा दिये और
उनका आशीर्वाद
लेकर आगे बढ़ चले।
राजगढ़ अभी दूर बहुत
दूर था। बाबा के
आश्रम से निकलते
ही अचानक
राजकुमार को उस
राजकन्या का ध्यान
आया, जिसे उसने वृक्ष
की जड़ से रोगमुक्त
किया था। राजा ने
उससे आग्रह
किया था कि वह
उनकी घोषणा के
अनुसार
पुत्री का वरण करे
और उनका आधा राज्य
ले ले। राजकुमार ने
अपने घोड़े
को उसी नगर की ओर
मोड़ दिया और कुछ
ही समय में
राजकुमार और
पद्मिनी उस नगर में
पहुंच गए।
राजा राजकुमार के
आगमन से बहुत
आनन्दित हुए और जब
उन्होंने
पद्मिनी को देखा उन
गदगद् हो गया।
उन्होंने राजकुमार
और पद्मिनी का पूरे
सम्मान के साथ
स्वागत किया।
राजा ने राजकुमार से
राजकुमारी को साथ
ले जाने का अनुरोध
किया तो राजकुमार
ने सहर्ष स्वीकार कर
लिया, लेकिन जब
राजा ने
अपना आधा राज्य देने
का प्रस्ताव
किया तो राजकुमार
ने उसे लेने में
असमर्थता प्रकट
की। राजकुमार ने एक
दिन वहां ठहर कर
राजा का आतिथ्य
स्वीकार किया और
अगले दिन
पद्मिनी और
राजकुमारी को साथ
लेकर राजगढ़ की ओर
रवाना हो गया।
उनका अगला पड़ाव
अब भभूत वाले
बाबा के यहां था।
मेहमानों का काफिल
उसी ओर बढ़
रहा था। सूर्य
की बाल-किरणें सारे
वातावरण
को बड़ी स्निग्धता प्
कर रही थीं। आकाश
निर्मल था।
पक्षी कलरव कर रहे
थे। सबके मन उमंग से
भरे थे। उन्हें राजगढ़
पहुंचने की जल्दी थी,
पर मार्ग के अनुपम
दूश्य उनके पैरों में
जंजीर डाल रहे थे।
पर्वत श्रृंखला पार
करते हुए तो वे इतने
अभिभूत हुए
कि घोड़ों पर से उतर
पड़े और उपत्यकाओं
की हरियाली तथा प
शिखरों पर
सुहावनी धूप
की सुनहरी चादर
देखकर सबके मन आनंद
से उछलने लगे।
पद्मिनी ने
प्रकृति की उस
छटा का जी-भर कर
पान करते हुए
राजकुमार का हाथ
पकड़ लिया। बोली,
“राजकुमार,
आदमी अगर
इतना ऊंचा उठ जाये,
इतना निर्मल
हो जाये
तो धरती पर स्वर्ग
उतर आये।” एक
अलौकिक आभा से
पद्मिनी का मुख-
मुण्डल दीप्त
हो रहा था। उसे
देखकर
ऐसा लगता था जैसे
इंद्रलोक की कोई
देवांगना इस
धरती पर आ गई हो।
वह
मुस्कराती थी तो प्य
के धवल निर्झर बहने
लगते थे। वह
हंसती थी तो सारी
पुष्पों से आच्छादित
हो उठती थी। बड़े
स्नेह से भीग कर
राजकुमार बार-बार
उस कोमलांगी की ओर
देखता था। उस
अनमोल
सम्पदा को पाकर वह
बार-बार अपने
भाग्य
को सराहता था। उसे
लगा, पर्वतों के
उतार-चढ़ाव से
पद्मिनी थक
जायेगी। किन्तु
पद्मिनी तो रुकने
का नाम ही नहीं ले
रही थी। उसने भावुक
होकर कहा,
“पद्मिनी तुम अब
घोड़े पर बैठ जाओ।
तुम्हारे पैर दर्द करने
लगेंगे।” पद्मिनी ने
बड़े उल्लास से कहा,
“क्यों तुम मुझे इस
आनंद से वंचित
करना चाहते हो?”
उसके इस उद्गार से
ऊंचे-ऊंचे पर्वत शिखर
निहाल हो गये,
उपत्यकाएं
मुस्करा उठीं और घने
गगनचुम्बी वृक्षों की
गहरी हो गई। जाते
समय राजकुमार ने वह
पर्वत-
माला बिना इधर-
उधर देखे योंही पार
कर ली थी, किन्तु
आज तो उसके साथ एक
ऐसा प्रकाशपुंज था,
जिसके आलोक में
भीतर-बाहर
कहीं भी अंधकार रह
नहीं सकता था। वे
लोग घोड़ों पर सवार
हो गये।
पर्वतों को लांघ कर
फिर मैदान में आ गये।
राजकुमार ने हंसकर
कहा, “हम लोग
भी कैसे हैं,
जहां घोड़ों पर
बैठना चाहिए था,
वहां बैठे नहीं, लेकिन
जहां पैदल चल सकते
थे, वहां घोड़ों पर
सवार हो गये हैं।”
पद्मिनी यह सुनकर
चुप न रह सकी।
बोली, “राजकुमार
आदमी पैदल चलता है
तो धरती को उसका
जाता है। पहाड़ों में
पैदल न
चलना पहाड़ों का अप
करना है।”
पद्मिनी की इस
बुद्धिमत्ता से
राजकुमार का रोम-
रोम पुलकित
हो उठा। वह क्षण
भर उसकी ओर
देखता रह गया।
बाबा का आश्रम अब
दूर नहीं था।
राजकुमार ने कहा,
“पद्मिनी, अब हम
उन बाबा के आश्रम में
पहुंच रहे हैं, जिन्होंने
मुझे एक
ऐसी चमत्कारी भभूत
दी थी, जिसे खाकर
मुझे कोई नहीं देख
सकता था और मैं
सबको देख
सकता था।” फिर कुछ
रुककर बोला,
“उसी भभूत को मुंह में
डालकर मैंने तुम्हारे
सिंहल द्वीप में प्रवेश
किया था।”
पद्मिनी ने कहा,
“तो तुम मेरे महल में
भी आये होंगे।”
“नहीं।” राजकुमार
बोला, “मैंने तुम्हारे
महल को बाहर से
देखा था।” “भीतर
क्यों नहीं आये?”
राजकुमारी ने
थोड़ा व्यग्र होकर
पूछा। “महल में
जाना चाहता था,
लेकिन जाने
क्या सोचकर मुझे डर
लगा। फाटक बंद था।
खोलने की हिम्मत
नहीं हुई। नगर
का एक चक्कर लगाकर
लौट आया। तभी मुझे
अचानक ध्यान
आया कि मैं अद्दश्य
तो हो गया हूं, पर
अपने असली रूप में कैसे
आऊंगा? जब मैं इस
चिन्ता में
डूबा था कि यही बा
आ खड़े हुए। मैंने उन्हें
अपनी चिन्ता बताई
तो उन्होंने भभूत
की एक डिब्बी और
दी और कहा कि इसे
खाओगे तो अपने
असली रूप में आ
जाओगे। यह कहकर
बाबा अंतर्धान
हो गये।”
पद्मिनी यह सुनकर
हंस पड़ी।

Saturday, 17 December 2011

कुएं का विवाह

एक बार राजा कॄष्णदेव
राय और तेनालीराम के
बीच किसी बात
को लेकर विवाद
हो गया। तेनालीराम
रुठकर चले गए। आठ-दस
दिन बीते,
तो राजा का मन
उदास हो गया।
राजा ने तुरन्त
सेवको को तेनालीराम
को खोजने भेजा।
आसपास का पूरा क्षेत्र
छान लिया पर
तेनालीराम
का कहीं अता-
पता नहीं चला।
अचानक राजा को एक
तरकीब सूझी। उसने
सभी गांवों में
मुनादी कराई
राजा अपने राजकीय
कुएं का विवाह
रचा रहे हैं, इसलिए
गांव के
सभी मुखिया अपने-अपने
गांव के कुओं को लेकर
राजधानी पहुंचे।
जो आदमी इस
आज्ञा का पालन
नहीं करेगा, उसे
जुर्माने में एक हजार
स्वर्ण मुद्राएं
देनी होंगी।
मुनादी सुनकर
सभी परेशान हो गए।
भला कुएं भी कहीं लाए-
ले जाए जा सकते हैं।
जिस गांव में
तेनालीराम भेष
बदलकर रहता था,
वहां भी यह
मुनादी सुनाई दी।
गांव
का मुखिया परेशान
था। तेनालीराम समझ
गए कि उसे खोजने के
लिए ही महाराज ने
यह चाल चली हैं।
तेनालीराम ने
मुखिया को बुलाकर
कहा “मुखियाजी, आप
चिंता न करें, आपने मुझे
गांव में आश्रय दिया हैं,
इसलिए आपके उपकार
का बदला में चुकाऊंगा।
मैं एक तरकीब
बताता हूं आप आसपास
के मुखियाओं
को इकट्ठा करके
राजधानी की ओर
प्रस्थान करें”। सलाह
के अनुसार
सभी राजधानीकी ओर
चल दिए। तेनालीराम
भी उनके साथ थे।
राजधानी के बाहर
पहुंचकर वे एक जगह पर
रुक गए। एक
आदमी को मुखिया का
संदेश देकर राजदरबार
में भेजा। वह
आदमी दरबार में
पहुंचा और तेनालीराम
की राय के अनुसार
बोला “महाराज!
हमारे गांव के कुएं
विवाह में शामिल होने
के लिए राजधानी के
बाहर डेरा डाले हैं। आप
मेहरबानी करके
राजकीय कुएं
को उनकी अगवानी के
लिए भेजें, ताकि हमारे
गांव के कुएं ससम्मान
दरबार के सामने
हाजिर हो सकें।
राजा को उनकी बात
समझते देर
नहीं लगी कि ये
तेनालीराम
की तरकीब हैं। राजा ने
पूछा सच-सच बताओ
कि तुम्हें यहाक्ल किसने
दी हैं? राजन! थोडे
दिन पहले हमारे गांव
में एक परदेशी आकर
रुका था। उसी ने हमें
यह तरकीब बताई हैं
आगंतुक ने जवाब दिया।
सारी बात सुनकर
राजा स्वयं रथ पर
बैठकर राजधानी से
बाहर आए और ससम्मान
तेनालीराम
को दरबार में वापस
लाए। गांव
वालो को भी पुरस्कार
देकर विदा किया।

Friday, 9 December 2011

भगवान पर भरोसा

जाड़े का दिन था और शाम
हो गयी थी। आसमान में
बादल छाये थे। एक नीम के पेड़
पर बहुत-से कौए बैठे थे। वे सब
बार-बार काँव-काँव कर रहे
थे और एक-दूसरे से झगड़ भी रहे
थे। इसी समय एक
छोटी मैना आयी और
उसी नीम के पेड़ की एक डाल
पर बैठ गयी। मैना को देखते
ही कई कौए उस पर टूट पड़े।
बेचारी मैना ने कहा—‘बादल
बहुत हैं, इसलिए आज
जल्दी अँधेरा हो गया है। मैं
अपना घोसला भूल गयी हूँ।
मुझे आज रात यहाँ रहने दो।’
कौओं ने कहा—‘नहीं, यह
हमारा पेड़ है। तू यहाँ से भाग
जा।’
मैना बोली—‘पेड़ तो सब
भगवान् के हैं। इस सर्दी में
यदि वर्षा हुई ओले पड़े
तो भगवान् ही हम लोगों के
प्राण बचा सकते हैं। मैं बहुत
छोटी हूँ, तुम्हारी बहिन हूँ,
मुझ पर तुम लोग दया करो और
मुझे भी यहाँ बैठने दो।’
कौओं ने कहा—‘हमें तेरी-
जैसी बहिन नहीं चाहिये। तू
बहुत भगवान् का नाम लेती है
तो भगवान् के भरोसे यहाँ से
चली क्यों नहीं जाती ? तू
नहीं जायगी तो हम सब तुझे
मारेंगे।’
कौए तो झगड़ालू होते ही हैं,
वे शाम को जब पेड़ पर बैठने
लगते हैं तब आपस में झगड़ा किये
बिना उनसे रहा नहीं जाता।
वे एक-दूसरे को मारते हैं और
काँव-काँव करके झगड़ते हैं।
कौन कौआ किस टहनी पर
रात को बैठेगा यह कोई
झटपट तै नहीं हो जाता।
उनमें बार-बार लड़ाई
होती है, फिर
किसी दूसरी चिड़िया को वे
अपने पेड़ पर तो बैठने ही कैसे
दे सकते थे। आपस की लड़ाई
छोड़कर वे मैना को मारने
दौड़े।
कौओं को काँव-काँव करके
अपनी ओर झपटते देखकर
बेचारी मैना वहाँ से उड़
गयी और थोड़ी दूर जाकर एक
आम के पेड़ पर बैठ गयी।
रात को आँधी आयी। बादल
गरजे और बड़े-बड़े ओले पड़ने लगे।
बड़े आलू-जैसे ओले तड़-तड़, भड़-
भड़ बंदूक की गोली-जैसे पड़ रहे
थे। कौए काँव-काँव करते
चिल्लाये; इधर-से-उधर
थोड़ा-बहुत उड़े; परंतु ओले
की मार से सब-के-सब घायल
होकर जमीन पर गिर पड़े।
बहुत-से कौए मर गये।
मैना जिस आम पर बैठी थी,
उसकी एक मोटी डाल आँधी में
टूट गयी। डाल भीतर से सड़
गयी थी और
पोली हो गयी थी। डाल
टूटने पर उसकी जड़ के पास पेड़
में एक खोंड़र हो गया।
छोटी मैना उसमें घुस गयी।
उसे एक भी ओला नहीं लगा।
सबेरा हुआ, दो घड़ी चढ़ने पर
चमकीली धूप निकली।
मैना खोंड़र में से निकली, पंख
फैलाकर चहककर उसने भगवान्
को प्रणाम किया और वह
उड़ी।
पृथ्वी पर ओले से घायल पड़े हुए
कौए ने मैना को उड़ते देखकर
बड़े कष्ट से
कहा—‘मैना बहिन ! तुम
कहाँ रही ?
तुमको ओलों की मार से किसने
बचाया ?’
मैना बोली—‘मैं आम के पेड़ पर
अकेली बैठी थी और भगवान्
की प्रार्थना करती थी।
दुःख में पड़े हुए असहाय
जीवको भगवान् के सिवा और
कौन बचा सकता है।’
लेकिन भगवान् केवल ओले से
ही नहीं बचाते और केवल
मैना को ही नहीं बचाते।
जो भी भगवान् पर
भरोसा करता है और भगवान्
को याद करता है, उसे भगवान्
सभी आपत्ति-विपत्ति में
सहायता देते हैं और
उसकी रक्षा करते हैं।

भला आदमी

एक धनी पुरुष ने एक मन्दिर
बनवाया। मन्दिर में भगवान्
की पूजा करने के लिये एक
पुजारी रखा। मन्दिर के
खर्चके लिये बहुत-सी भूमि, खेत
और बगीचे मन्दिर के नाम
लगाये। उन्होंने ऐसे प्रबन्ध
किया था कि जो मन्दिर में
भूखे, दीन-दुःखी या साधु-संत
आवें, वे वहाँ दो-चार दिन
ठहर सकें और उनको भोजन के
लिये भगवान् का प्रसाद
मन्दिर से मिल जाया करे।
अब उन्हें एक ऐसे मनुष्य
की आवश्यकता हुई जो मन्दिर
की सम्पत्ति का प्रबन्ध करे
और मन्दिर के सब
कामोंको ठीक-ठीक
चलाता रहे।
बहुत-से लोग उस धनी पुरुष के
पास आये। वे लोग जानते थे
कि यदि मन्दिर
की व्यवस्था का काम मिल
जाय तो वेतन अच्छा मिलेगा।
लेकिन उस धनी पुरुषने
सबको लौटा दिया। वह सबसे
कहता था—‘मुझे
भला आदमी चाहिये, मैं
उसको अपने-आप छाँट लूँगा।’
बहुत-से लोग मन-ही-मन उस
धनी पुरुष को गालियाँ देते
थे। बहुत लोग उसे मूर्ख
या पागल बतलाते थे। लेकिन
वह धनी पुरुष किसी की बात
पर ध्यान नहीं देता था। जब
मन्दिर के पट खुलते थे और लोग
भगवान् के दर्शन के लिए आने
लगते थे तब वह धनी पुरुष अपने
मकानकी छत पर बैठकर
मन्दिर में आनेवाले
लोगों को चुपचाप
देखा करता था।
एक दिन एक मनुष्य मन्दिर में
दर्शन करने आया। उसके कपड़े
मैले और फटे हुए थे। वह बहुत
पढ़ा-लिखा भी नहीं जान
पड़ता था। जब वह भगवान्
का दर्शन करके जाने लगा तब
धनी पुरुष ने उसे अपने पास
बुलाया और कहा—‘क्या आप
इस मन्दिर
की व्यवस्था सँभालने का काम
स्वीकार करेंगे ?’
वह मनुष्य बड़े आश्चर्य में पड़
गया। उसने कहा—‘मैं तो बहुत
पढ़ा-लिखा नहीं हूँ। मैं इतने
बड़े मन्दिर का प्रबन्ध कैसे
कर सकूँगा ?’
धनी पुरुषने कहा—मुझे बहुत
विद्वान नहीं चाहिये। मैं
तो एक भले आदमी को मन्दिर
का प्रबन्धक
बनाना चाहता हूँ।’
उस मनुष्य ने कहा—‘आपने इतने
मनुष्यों में मुझे
ही क्यों भला आदमी माना ?’
धनी पुरुष बोला—‘मैं
जानता हूँ कि आप भले
आदमी हैं। मन्दिर के रास्ते में
एक ईंटका टुकड़ा गड़ा रह
गया था और
उसका कोना ऊपर
निकला था। मैं इधर बहुत
दिनों से देखता था कि उस ईंट
के टुकड़े की नोक से
लोगों को ठोकर लगती थी।
लोग गिरते थे, लुढ़कते थे और
उठकर चल देते थे। आपको उस
टुकड़े से ठोकर लगी नहीं; किंतु
आपने उसे देखकर ही उखाड़ देने
का यत्न किया। मैं देख
रहा था कि आप मेरे मजदूर से
फावड़ा माँगकर ले गये और उस
टुकड़े को खोदकर आपने
वहाँ की भूमि भी बराबर कर
दी।’
उस मनुष्य ने कहा—यह
तो कोई बात नहीं है। रास्ते
में पड़े काँटे, कंकड़ और ठोकर
लगने योग्य पत्थर,
ईंटों को हटा देना तो प्रत्येक
मनुष्य का कर्तव्य है।’
धनी पुरुषने कहा—‘अपसे
कर्तव्यको जानने और पालन
करनेवाले लोग ही भले
आदमी होते है।’
वह मनुष्य मन्दिर
का प्रबन्धक बन गया। उसने
मन्दिर का बड़ा सुन्दर
प्रबन्ध किया।